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महाभारतमीमांसा

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  • महाभारतमीमांसा

की ब्राह्मणों के विषयमें जैसी समझ थी, देखते थे, बल्कि तप-सामर्थ्य के कारण वह भली भाँति प्रकट हो जायगी । महा- ब्राह्मणोंमें वे विलक्षण शक्ति भी मानते भारतके आदि पर्वमें कण्व ऋषिका जैसा थे। स्वभावतः लोगोंकी यह धारणा हो वर्णन है, उससे प्रकट है कि ब्राह्मणोंने गई थी कि, वसिष्ठकी तरह नाना प्रकार- वेद-विद्या पढ़ने और इन्द्रिय-दमन कर के सुख-साधन केवल अपनी इच्छासे तप करनेको संसारमें अपना कर्तव्य मान अपने लिये नहीं, किन्तु औरोके उपयोगके रक्खा था। वसिष्ठ और विश्वामित्रके लिये, उत्पन्न करनेकी शक्ति ब्राह्मणों में है। झगड़ेके वर्णनसे भी वह भेद खुल जायगा इतिहासके जमानेमै भी कई बार देखा जो ब्राह्मण और क्षत्रियके बीच मौजूद जाता है कि सदाचार और तपमें कुछ था। इन्द्रिय-दमन,शान्ति और तप करना, | अद्भुत सामथ्र्य है। फिर प्राचीन कालमें ब्राह्मणोंके मुख्य कर्तव्य माने जाते थे। उसके सम्बन्ध में उससे भी अधिक विश्वामित्रने वसिष्ठको कामधेनु हर ली: कल्पना रही हो तो कोई आश्चर्य नहीं। तब भी वसिष्ठको क्रोध नहीं आया । वसिष्ठका प्रभाव देखकर विश्वामित्रने विश्वामित्रने वसिष्ठके कुल सौ बंटोंको आखिर यही कहा-"धिग्बलं क्षत्रियबलं मार डाला: फिर भी वसिष्ठने ब्रह्मदगड ब्रह्मतेजोबलं बलम् ।” अस्तु: इस प्रकार नहीं उठाया । विश्वामित्रकी स्थिति इसके सदाचार, इन्द्रिय-दमन, शान्ति और विपरीत दिखलाई गई है। उसकी शान्ति संसारसे विराग आदि गुणोंसे ब्राह्मणोंका बातकी बातमें डिग जाती थी। सैकड़ों आध्यात्मिक तेज सहज ही बढ़ता गया बरसोतक तो उसने तपस्या की, पर और उनके विषयम लोगोका पूज्य भाष हो मेनकाको देखते ही वह कामके वशमें गया: सब वर्गों पर ब्राह्मणोंकी श्रेष्ठताकी हो गया। यद्यपि इस प्रकार शान्ति छाप लग'गई: और इसी कारण वर्ण- और इन्द्रिय-दमन बार बार खण्डित हुआ, : विभागके लिये एक प्रकारसे अधिक तथापि उसने ब्राह्मण्य-प्रानिके लिये बार सहायता मिल गई। बार प्रयत्न किया।अन्तमें जब शान्ति और इन्द्रियजय पर उसका अधिकार हो गया चातुर्वण्येकी ऐतहासिक उत्पति। तब वह तत्काल ब्राह्मण हो गया। महा- हिन्दुस्तानके प्राचीन कालसे ऐतिहा- भारतमें ऐसी ऐसी अनेक कथाएँ हैं। सिक रीति पर विचार करते समय जरत्कारु ऋषिने, केवल तप पर ध्यान ऊपर किये हुए विवेचनके सारांशसे पाठक देकर, विवाह करनेका विचार छोड़ इस बातकी कल्पना कर सकेंगे कि दिया था। परन्तु पितरोंकी आज्ञासे एक वर्ण-व्यवस्थाकी उत्पत्ति क्योंकर हुई । बेटा होनेतक गृहस्थाश्रममें रहकर, पुत्र जिस समय हिन्दुस्तानमें आर्य लोग पहले- हो जानेके पश्चात्, गृहस्थीसे अलग होकर पहल आये, उस समय उनमें ब्राह्मण और उसने तपस्या को । इन सब कथाओंसे क्षत्रिय, ये दो हो गये थे। वेद-विद्या पढ़- प्रकट होता है कि, युधिष्ठिरने ब्राह्मणके कर यज्ञ-याग आदिके समय ऋत्विजका जो लक्षण बतलाये हैं वे शान्ति, दया, दान, काम करनेके कारण ब्राह्मणोंको बड़प्पन सत्य, तप और धर्म आदि गुण ब्राह्मणमें मिला और उनकी स्वतन्त्र जाति बन गई। सचमुच थे । उक्त गुणोंके कारण लोग ' ब्राह्मणोंके ये काम कठिन थे। विश्वामित्र- ब्राह्मणोंको सिर्फ आदरकी ही दृष्टिसेन वाली कथासं प्रकट होता है कि उस