पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/१८५

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  • इतिहास किन लोगोंका है। &

१५४ माना जाता था । ब्राह्मण-कालसे लेकर चाहिये कि ये चन्द्रवंशी लोग सूर्यवंशी महाभारत काल पर्यन्त अर्थात् सौतिके क्षत्रियोंसे कुछ भिन्न रहे होंगे। इनकारक समयतक यह कल्पना थी. कि कुरुक्षेत्र कुछ कुछ सांवला था। अगर यह कहा प्रान्तके आर्य लोगोंसे पावके आर्य कम जाय कि यहाँकी बहुत गरम हवाके कारण सभ्य थे और उनका श्राचरण भी कुछ / इनकी रंगत बदल गई होगी, तो पजाब- अशुद्ध था। इस बातका बढ़िया उदाहरण | की हवा भी तो गरम ही है । पहले लिखा शल्य और कर्णके सम्भाषणमें मिलता गया है कि मल्लविद्यासे इन्हें बहुत प्रेम है । यह महाभारतके कर्ण पर्व में है। कर्ण था: सो यह विशेषता इनके वंशजों में कहता है-"मद्र देशके लोग अधम | आजकल भी पाई जाती है। इन लोगों में होते हैं और कुत्सित भाषण करते हैं। मद्र द्रविड़ जातिका मिश्रण कैसे हो गया ? देशमें पिता-पुत्र प्रभृति, सभी साथी, इस सम्बन्धमें कहा गया है कि ये लोग मेहमान, दास और दासी वगैरह एक | हिमालयसे गङ्गाकी तङ्ग घाटियों में होकर जगह मिलकर उठते-बैठते हैं । वहाँकी कठिन गस्तेसे पाये थे, इस कारण इनमें लियाँ पुरुषोंके साथ अपनी इच्छासे सह-नियाँ बहुत थोड़ी थीं। परन्तु हिन्दु- वास करती हैं। उस देशमें धर्म बुद्धि स्थानमें आने पर इन लोगोंने द्रविड़ जाति- बिलकुल नहीं है। मद्र देशमें आचरण- | को बेटियाँ व्याह लेने में कुछ सङ्कोच नहीं का विधि-निषेध नहीं है : वहाँ इस बात- किया। यही कारण है कि गङ्गा-यमुनाके का विचार नहीं कि कौन काम करना प्रान्तोंमें आजकल जो बस्ती है, उसमें चाहिए और कौन न करना चाहिये। द्रविड़ जातिका मिश्रण है। इस कल्पना- स्त्रियाँ शराबके नशेमें मस्त रहती हैं।" का उद्गम महाभारतको कई कथाओं में इस प्रकार कर्णने शल्यकी बहुत निन्दा | मिलता है। की है। यद्यपि इसमें अतिशयोक्ति है, युक्तप्रदेशके वर्तमान मिश्र आर्य । फिर भी यह तो स्पष्ट है कि पञ्जाब-निवा- सियोंका श्राचार-विचार कुरुक्षेत्रके निवा जिस प्रदेशमें गङ्गा और यमुना बहती सियोंसे कम दर्जेका था। सन् ईसवीसे है, उसमें पहले द्रविड़ जातिकी आबादी लगभग साढ़े तीन हज़ार (३५००) वर्ष थी । वे द्रविड़ नागवंशी होंगे। यह लिखा पूर्व चन्द्रवंशी लोग कुरुक्षेत्रमें उतरे और जा चुका है कि यमुना किनारे तक्षक नाग दक्षिणको ओर बहत करके वर्तमान रहता था: उसे अर्जनने भगा दिया था। प्रवधको छोडकर सारे संयक्त प्रदेशमें फैल ऐसा ही एक नाग यमना किनारे मथराके गये; अर्थात् रुहेलखण्ड, आगरे, मथुरा, पास रहता था। उसे श्रीकृष्णने जीतकर कानपुर और प्रयाग आदिमें उनकी निकाल दिया। कालियाकी प्रसिद्ध कथाका बस्तियाँ हो गई। भारती युद्ध के समय ये ऐतिहासिक स्वरुप ऐतिहासिक रीतिसे खब उन्नति दर्शाते थे और वैदिक धर्मकी ऐसा ही मानना पड़ता है। इससे भी इन्होंने पूर्ण उन्नति की। ये लोग पूर्ण दक्षिणमें वसुराजा उपरिचरने चेदी राज्य मार्य जातिके होंगे। अब यह प्रश्न होता है स्थापित किया था। उसकी कथा भी इसी कि यहाँ आजकल मिश्र जातिके जो लोग प्रकारकी मालूम पड़ती है। अस्तु; इससे हैं, वे कैसे उत्पन्न हुए । अतः अब इसपर प्रकट है कि गङ्गा-यमुनाके प्रदेशमें नाग विचार करते हैं। किन्तु स्मरण रखना आनिके लोग बहुन थे। नागकन्या उल्पी