पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/१८१

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ॐ इतिहास किंन लोगोंका है। * कि हिन्दुस्थान में प्रार्य लोग बिलकल है कि यह प्रार्य है और यह दास है। फिर हो नहीं। इसलिए अब यहाँ ज़रा विस्तार- तो आर्य और म्लेच्छका भेद उत्पन्न हो के साथ इस बातका विचार करना है कि गया और लोग समझने लगे कि ये भिन्न हिन्दुस्थानमें आर्य लोग हैं भी या नहीं: भिन्न जातियाँ हैं । तथापि महाभारतमें भी और ये चन्द्रवंशी लोग आर्य थे या कौन आर्य शब्द विशेष जातिवाचक माना जाता थे। अब हमें वेद और महाभारतसे इसका था। हिन्दुस्थानके भिन्न भिन्न लोगोंकी प्रमाण देखना चाहिये कि हिन्दुस्थानमें प्रार्य गणना करते समय आर्य,म्लेच्छ और मिश्र पहले भी थे और अब भी हैं। ऋग्वेदके इन तीन भेदोंका वर्णन महाभारतमें है। अनेक उल्लेखोसे स्पष्ट होता है कि हिन्दु- आर्या म्लेच्छाश्च कौरव्य सौर्मिश्राः स्थानमें प्रार्य-जातिके लोग थे। किंबहना: पूरुषा विभो। (भीष्म 8-११३) आर्य शब्द पहले जातिवाचक ही था, इसी प्रकार जिस समय अर्जुनने फिर आगे चलकर वह स्वभाववाचक अश्वमेधके अवसर पर दिग्विजय किया, हो गया । ऋग्वेदमें वह जातिवाचक ही उस समय अनेक राजाओन विरोध किया पाया जाता है। मूल-निवासी दास शब्दके था। उन विरोधियों में म्लेच्छ और प्रार्य विरोधमें यह शब्द व्यवहृत है। ऋग्वेदके दोनो श्रेणियोंके राजाथे (अश्व० अ० ७३) । १० वे मगडलके ३८ व सूक्तमें ३री ऋचा म्लेच्छाश्चान्ये बहुविधाः पूर्व ये निक- यह है- तारण । श्रार्याश्च पृथिवीपालाः प्रहृष्टा “यो ना दास पार्यो वा पुरुष्टुता नरवाहनाः ॥ समोयुः पाण्डुपुत्रेण बहवो देव इन्द्र युधये चिकेतति ॥" युद्धदुर्मदाः। अर्थ-“हे इन्द्र ! जो हमस युद्ध इससे स्पष्ट होता है कि सिकन्दरके करना चाहता हो, वह चाहे दास हो, बादतक-महाभारत-काल पर्यन्त-हिन्दु- चाहे आर्य हो, चाहे अदेव हों” इस वाक्य- । स्थानमें कुछ राजा लोग अपनेको आर्य में तीन जातियोंका उल्लेख है । दास, आर्य कहते और कुछ म्लेच्छ माने जाते थे। और अदेव । आर्य यानी हिन्दुस्थानमें पाये हिन्दुस्थानी लोगोंकी फेहरिस्त भीष्म पर्व- हुए आर्य: दास यहाँके (मूल ) निवासी: में है । उसमें भी कुछ म्लेच्छ राजाओंका प्रदेव अर्थात् असुर; यानी 'जेन्दावेस्ता' स्पष्ट उल्लेख है। इससे प्रकट होता है में वर्णित पारसी लोग, जिनसे विभक्त कि आर्य नाम अबतक जातिवाचक था। होकर हिन्दुस्थानी आर्य यहाँ आये थे। आर्यावर्त शब्दका उपयोग हिमालय और सायनाचार्यके समय आर्य शब्दके वंश- विन्ध्य पर्वतके बीचवाले प्रदेशके लिए वाची होनेकी कल्पना नष्ट हो गई थी। किया जाता है। श्रार्य शब्दसे सिर्फ जाति- फिर भी. उन्होंने आर्यका अर्थ त्रैवर्णिक का ही भेद नहीं दिखाया जाता था, किन्तु यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ऐसाही भाषा-भेद भी प्रदर्शित किया जाता था। किया है। इसका तात्पर्य भी यही निक- महाभारतमें एक स्थान पर 'नार्या म्ले- लता है। वैदिक कालमें आर्यों और च्छन्ति भाषाभिः' कहा है । इस वाक्यका दासोका परस्पर विरोध था। ब्राह्मण- मतलब यह है कि भाषा बोलनेमें आर्य कालमें भी विरोध मौजूद था। फिर धीरे लोग गलतियाँ नहीं करते, जैसे कि म्लेच्छ धीरे शद्रोंमें दासोका अन्तर्भाव हो गया: लोग करते हैं। महाभारत-कालमें आर्य इस कारण इस तरहका विरोध न रहा शन जातिवाचक था और म्लेच्छोंके