पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/१३७

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१११ & भारतीय युद्धका समय 8 . सन् २६५० ईसवी - .. मन ईमपीके ३००५ वर्ष पहले . - कृत्तिका .. . गर । विषुववृत्त कृत्तिका विषुववृत्त - शर मंपातबिंद मपातबिद ' , - क्रांतिवृत्त क्रांतिवृत्त इस समय कृत्तिका विषुववृत्तके ऊपर ; भीष्मके पिता शंतनुके भाई थे। इसका उत्तरमें है। पहले किसी समयमें वह अर्थ यह होता है कि ऋग्देवके बाद थोड़े विषुववृत्त पर थी । क्रान्तिवृत्त और वर्षों के भीतर भारतीय युद्ध हुआ। शत- विषुववृत्तका कोण २३ अंशोंका है और पथ ब्राह्मणमें पूरे ऋग्देवका उल्लेख है कृत्तिकाका शर भी निश्चित तथा स्थिर है। और जनमेजय पारीक्षित-पांडवोंके पोते- इससे यह परिणाम निकाला जा सकता है का भी उल्लेख है। इसलिये भारतीय कि संपातविन्द उस समय कितने पीछे यद्ध शतपथ-ब्राह्मणके पहले हुना। था। दीक्षितने सन् १६००की स्थितिके ६८° दीक्षितने, शतपथ-ब्राह्मणके अन्तर्गत अंश पीछे होना निश्चित किया है। अर्थात्, “कृत्तिकाका उदय ठीक पूर्व में होता है" १६००के पहले, ६Ex७२ (प्रनि ७२ वर्षोंमें ' इस वाक्यके आधार पर, उस ग्रन्थका संपात एक अंश पीछे हट जाता है: इस समय सन् ईसवीके लगभग ३००० वर्ष हिसाबसे) = ४६ वर्ष पाते हैं । इनमें . पूर्व ठहराया है। अतएव भारतीय युद्ध- १६०० घटा देनेमे, मन ईसवीके लगभग , का जो समय सन् ईसवीके ३१०१ वर्ष REL६ वर्ष पहले, शतपथ-ब्राह्मणका पूर्व माना गया है वह उचित है और उक वाक्य लिखा गया होगा। शतपथ- ऋग्देवकी रचनाका अंतिम समय सन् ब्राह्मणसे कई शताब्दियों के पहले ऋग्वेद ईसवीके ३२०० वर्ष पूर्व ठहरता है । बस, तैयार हो गया था । अर्थात् ऋग्वेदका यही हमारी अनुमान-सरणि है । हम अन्तिम काल सन् ईसवीके ३२०० वर्ष समझते हैं कि इस अनुमान-परम्परामें पूर्व मानना चाहिये । भारतीय युद्ध ' मीनमेख निकालनेके लिये स्थान नहीं है। ऋग्देवके अनन्तर १०० वर्षों में हुआ, यह बात मैक्डानल आदि सब पाश्चात्य अतएव दीक्षित द्वारा बतलाये हुए काल पंडितोको मान्य है कि भारतीय यद्ध पर हमने अपने अनुमानकी यह नींव ऋग्देवके बाद और शतपथ-ब्राह्मणके डाली है, कि ई० स० पू० ३१०१ ही पहले हुआ। वे ऋग्देव और शतपथ-ब्राह्मण- भारतीय युद्धका समय निश्चयपूर्वक के समय को ही इस ओर बहुत खींचते सिद्ध होता है। हैं। परन्तु यह उनकी भूल है। उसके हम अपने कथनका सारांश पाठकोंके लिये कोई रढ़ आधार नहीं है। दीक्षितने सामने संक्षेपमें फिर रखते हैं । ऋग्देवमें, जो समय बतलाया है वह ज्योतिषविषयक अंत अंतमें, देवापिका मूक्त है। देवापि, डल्लेम्बके आधार पर गणित करके निर्मित