पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/१२

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तथा अनुपम संयोग स्वप्नके दृश्यकी तरह लुप्त हो गया और हमारे मन में एक स्थायी शोक उत्पन्न करनेका कारण हो गया। अस्तु। इस घटना होने पर भी हमारे मनकी इच्छाने हमें इस बात पर बेचैन कर दिया कि चाहे सारा महाभारत न हो सके परन्तु तीन भागोंको-हरिवंशपर्व, पूर्वो- सर भाग और उपसंहारको-तो हिन्दीमें अवश्य ही प्रकाशित करना चाहिए, और धके बदलेमें महीसे ही काम निकालना चाहिए । अतएव हमने पहले १० भाग-उपसंहार-का हिन्दी-अनुवाद प्रकाशित करना निश्चित किया । परन्तु हमारे लिए अनुकूल बात एक भी नहीं दिखाई देती थी। एक ओर तो ये बातें दूसरी ओर इन्फ्लुएा तथा योरोपीय महायुद्धके कारण निस्सीम महर्घता। इस प्रयतापसे पीड़ित होने पर हमने भोपाल एजेन्सीके पोलिटिकल एजेन्ट मेहरबान कर्मल ल्युअर्ड साहबसे भेंट की और उन पर अपना मनोगत भाव प्रकट किया। (सन् १६१२ में यही सज्जन होल्कर महाराजके प्राइवेट सेक्रेटरी थे: उसी समय हमसे इनसे परिचय हो चुका था।) यद्यपि जाति और धर्मसे कर्नल ल्युअर्ड साहब भिन्न है, तथापि उनके कार्यों को देखकर कहना पड़ता है कि वे हिन्दू है। सेन्ट्रल इण्डियामें उनका बहुतसा समय व्यतीत हुआ है । हिन्दी, संस्कृत और मराठीका ग्रन्थ-लेखनोपयोगी अभ्यास करके उन्होंने सेन्ट्रल इण्डियाके गजेटियर आदि ग्रन्थ प्रकाशित किये हैं। अब तो वे होल्कर दरबारके पुराने कागजपत्रोंके आधार पर होल्करशाहीकी सुविख्यात अहिल्याबाईका विश्वसनीय तथा विस्तृत चरित्र प्रकाशित कर रहे हैं। ऐसे ग्रन्थ- प्रेमो पुरुषसे भेट होने पर हमारा बड़ा लाभ हुअा। उनकी सिफारिशसे हम मध्य- भारतके राजगढ़ दरबार और वहाँके कर्मचारियोंसे मिल सके और हमें इस "महा- भारत-मीमांसा" के प्रकाशित करनेके लिए तीन हजार रुपयोंकी सहायता मिली। इसी कारण अपने ध्येयके अनुसार इस समयकी कठिन परिस्थितिमें भी हम इस प्रन्थको अल्प मूल्यमें दे सके हैं। यह "महाभारत-मीमांसा" मूल पुस्तक 'उपसंहार' के नामसे मराठीमें प्रका- शित हुई है, जिसके लेखक ग्वालियरके रिटायर्ड चीफ जस्टिस तथा बम्बई विश्व- विद्यालयके आनरेरी फेलो राव बहादुर सी०व्ही. वैद्य एम०ए० एल एल० बी० हैं। इसके हिन्दी-अनुवादक पण्डित माधवरावजी सप्रे बी० ए० हिन्दी संसारके एक लब्धप्रतिष्ठ लेखक हैं। "छत्तीसगढ़-मित्र," "हिन्दी ग्रन्थमाला," "हिन्दी केसरी," "हिन्दी-दासबोध,” स्वर्गीय लोकमान्य तिलकके "गीतारहस्य" के हिन्दी-अनुवाद, "प्रात्म-विद्या," "कर्मवीर" के वर्तमान संचालन आदि हिन्दी-सेवाके महान् कृत्वोंके कारण उनसे हिन्दी-जनता भली भाँति परिचित है। इसलिए अनुवादकी प्रशंसा करने की प्रावश्यकता कुछ भी नहीं है। आशा है कि हिन्दी-प्रेमी सजन इस ग्रन्थको अपना- कर हमारे उत्साहको बढ़ावेंगे। ग्रन्थके अन्त में महाभारत-कालीन भारतवर्षका नकशा परिश्रमपूर्वक तैयार करके जानबूझकर दिया गया है। श्राशा है कि इससे हमारे पाठकोंकी, मनोरजनके साथ ही, ज्ञानवृद्धि भी होगी।