पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/१०१

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  • महाभारत ग्रन्थका काल *

हमने निश्चित किया है, अर्थात् ईसवी अब अन्तमें हम चौथे अन्तःप्रमाणका सन्के पहले २५०-३०० वर्ष, उसके विचार करेंगे। महाभारतमें ज्योतिष- विरुद्ध इन बड़े छन्दोंके विचारसे भी सम्बन्धी जो बातें पाई जाती हैं, उनका कोई प्रमाण नहीं पाया जाता। उपयोग काल-निर्णयके लिये विशेष रीति- अब हम तीसरे अन्तःप्रमाणका विचार से नहीं हो सकता । इसका विस्तार- करेंगे। आर्यावर्तके धार्मिक और राज- सहित विवेचन आगे चलकर किया कीय इतिहासकी घटनाओमें, बुद्धके धर्म- जायगा । महाभारतमें आकाशस्थ ग्रहों मतका, अथवा ग्रीक लोगोंके साथ युद्ध और नक्षत्रोंकी स्थितिका वर्णन किया गया होनेका, अथवा उनके साथ कुछ व्यवहार है, जिसके आधारपर कुछ लोगोंने ग्रन्थ- होनेका समय निर्णीत है। अतएव यह के कथानकके समयका निर्णय करनेका देखना चाहिये कि उस बातका कहीं यत्न किया है, पर वह सफल नहीं हुअा। उल्लेख है या नहीं। यह प्रमाण अत्यन्त | इसमें सन्देह नहीं कि महाभारतमें नक्षत्र, महत्त्वका है। इस प्रमाणके आधारपर मास, अयन, पक्ष, इत्यादिके नाम पाये हमने मुख्यतः महाभारतके पूर्व-कालको जाते हैं और इनसे प्राचीन समयका बोध मर्यादा निश्चित की है । गौतम बुद्धकी होता है : तथा महाभारत ग्रन्थके काल- सत्यका समय ईसवी सनके पहले ४७४/ निर्णयमें कुछ थोडी सी सहायता भी है। अर्थात्, बौद्ध-धर्मका प्रसार ईसवी मिलती है, परन्तु इस दृष्टि से उस वर्णनका सनक ४५०-४०० वर्ष पहले हुश्रा था। कुछ महत्त्व नहीं है। इस विषयका विचार . महाभारतमें बुद्धका नामतक नहीं है, आगे किया ही जानेको है, इसलिये परन्तु बौद्ध भिक्षुओं और बौद्ध मता- यहाँ अधिक विस्तारकी श्रावश्यकता नहीं। का निर्देश है। यही हाल जैन धर्मका ज्योतिष-सम्बन्धी सिर्फ एक ही बात भी है। जैन-धर्म-प्रचारक महावीर वुद्धके काल-निर्णयके काममें उपयोगी हो सकती समय था । उसके धर्मका प्रचार भी है और उसका उल्लेख हम प्रारम्भमें ही बौद्ध-धर्मके साथ साथ हो रहा था। कर चुके हैं। यह निषेधात्मक बात अत्यन्त महाभारतमें जिनका नाम नहीं है, महत्त्वकी है कि महाभारतमें राशियोंका परन्तु 'क्षपणक' के नामसे जैनोंका उल्लेख नहीं है। हम बतला चुके हैं कि उल्लेख किया गया है। इससे भी वही ईसवी सनके पूर्व लगभग २०० के अन- काल निश्चित होता है। ग्रीक लोगोंका न्तर इस देशमें राशियोंका प्रचार हुआ है और पार्योंका युद्ध-प्रसङ्ग सिकन्दरके और महाभारत इसके पहलेका है। समय हुआ । अर्थात्, ईसवी सन्के लग- अब बाह्य प्रमाणोंका विचार किया भग ३०० वर्ष पहले हमें ग्रीक लोगोंकी जायगा । यह प्रकट है कि जिन ग्रन्थों युद्ध-कलाका परिचय था । यवनोंकी अथवा शिलालेखों में महाभारतका उल्लेख युद्ध-कुशलताका वर्णन महाभारतमें दो पाया जाता है, वे अत्यन्त महत्वके प्रमाण तीन स्थानोपर पाया जाता है। यवनोका हैं। ऐसा एक प्रमाण प्रारम्भमें ही दिया उल्लेख भी बार बार किया गया है। गया है । “गुप्त इन्स्क्रिपशन्स" के तीसरे अतएव यह बात निश्चित है कि महाभारत | भागमें सर्वनाथका जोशिलालेख है, उस- ईसवी सन्के पहले ३०० वर्षके इस पार• में ईसवी सन्के ४४५ वर्ष पहलेकी एक- का होना चाहिये। लक्षात्मक भाग्नमहिनाका स्पष्ट उल्लेख