पृष्ठ:महात्मा शेख़सादी.djvu/६७

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ज़िन्दगी दो चार दिन से ज़्यादा न रहेगी, मेरे लिए दुःख सुख दोनों बराबर हैं। तू ऊंचे आसन पर बैठा दे तो उसका खुशी नहीं, सिर काट डाल तो उसका कुछ रंज नहीं। मरने पर हम और तुम दोनों बराबर हो जायंगे। दयाहीन बादशाह यह सुनकर और भी बिगड़ा, और हुक्म दिया कि इसकी ज़बान तालू से खींच ली जाय। फ़क़ीर बोला मुझको इसका भी भय नहीं है। खुदा मेरे मन का हाल बिना कहे ही जानता है। तू अपने को रो जिस शुभ दिन को मरेगा देश में आनन्दोत्सव की तरंगें उठने लगेंगी।

(८) एक कवि किसी सज्जन के पास जाकर बोला कि मैं बड़ी विपत्ति में पड़ा हुआ हूं, एक नीच आदमी के मुझ पर दस रुपये आते हैं। इस ऋण के बोझ से मैं दबा जाता हूं। कोई दिन ऐसा नहीं जाता कि वह मेरे द्वार का चक्कर न लगाता हो। उसकी वाण सरीखी बातों ने मेरे हृदय को चलनी बना दिया है। वह कौन सा दिन होगा कि मैं इस ऋण से मुक्त हो जाऊंगा। सज्जन पुरुष ने यह सुन कर उसे एक अशरफी दी। कवि अति प्रसन्न हो कर चला गया। एक दूसरा मनुष्य वहां बैठा था। बोला, आप जानते हैं यह कौन है। यह ऐसा धूर्त है कि बड़े बड़े दुष्टों के भी कान काटता है। यह अगर मर भी जाय तो रोना न चाहिये।