पृष्ठ:महात्मा शेख़सादी.djvu/६६

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जब खा पी कर निश्चिन्त हुआ तो राजा को उस गंवार की याद आई। उसे पकड़वा मंगाया और तलवार खींच कर उसका सिर काटने पर तैयार हुआ। देहाती जीवन से निराश होगया और निर्भय होकर बोला, हे राजा, तेरे अत्याचार से सारे देश में हाय हाय मची हुई है। कुछ मैं ही नहीं बल्कि तेरी समस्त प्रजा तेरे अत्याचार से घबड़ा उठी है। यदि तुझे मेरी बात कड़ी लगती है तो न्याय कर कि फिर ऐसी बातें सुनने में न आवें। इसका उपाय मेरा लिर काटना नहीं, बल्कि अत्याचार को छोड़ देना है। राजा के हृदय में ज्ञान उत्पन्न होगया। देहाती को क्षमा कर दिया और उस दिन से प्रजा पर अत्याचार करना छोड़ दिया।

(७) सुना है कि एक फ़कीर ने किसी बादशाह से उसके अत्याचारों की निन्दा की। बादशाह को यह बात बुरी लगी और उसे कै़द कर दिया। फ़क़ीर के एक मित्र ने उससे कहा, तुम ने यह अच्छा नहीं किया। बादशाहों से ऐसी बातें नहीं कहनी चाहियें। फ़क़ीर बोला, मैंने जो कुछ कहा वह सत्य है, इस क़ैद का क्या डर, दो चार दिन की बात है। बादशाह के कान में यह बात पहुंची। फ़क़ीर को कहला भेजा, इस भूल में न रहना कि दो चार दिन में छुट्टी हो जायगी, तुम उसी कै़द में मरोगे। फ़क़ीर यह सुन कर बोला, जाकर बादशाह से कहदो कि मुझे यह धमकी न दें। यह