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परिच्छेद]
(७७)
वङ्गसरोजिनी।

प्रहरी,--"आप कहांसे आए हैं ? आपका नाम क्या है ? और काम क्या है ?"

अश्वारोही,--"अच्छा, तुम इतने ही में समझ लोगे! सूचना दो कि "भागलपुर का राजा उपस्थित है।"

द्वारपालगण महाराज का परिचय पाकर खड़े होगए और सभोने अभिवादन किया। महाराज ने एफ से पुनः सूचना देने का अनुरोध किया। द्वारपाल आज्ञा शिरोधार्य करके भीतर गया। अनंतर जो महाराज के समीप प्रहरीगण खड़े थे, परस्पर धीरे धीरे सभोंने उनके परिचय पर तर्क-वितर्क करना भारम्भ किया।

एक ने कहा, "ये क्या तुगरलखां के दूत बनकर आए हैं ? "

दूसरा,--"नहीं जी! कोई सिपहसालार होंगे। देखो, पोशाक वैसी ही है।"

तीसरा,--"नहीं नही ! बङ्गले के कोई राजा होंगे।"

चौथा,'-"वाह ! राजा भी कहीं यों अकेला आता है ? कोई ज़िमीदार होगा।

एक,--"ठीक तो कहा । खैर, अभी सम मुफस्सिल हाल मालूम होजायगा।"

प्रहरीगण महाराज का परिचय निर्णय न करके क्षुण्णमन से खड़े रह गए, इतनही में द्वारपाल के सङ्ग बीस पच्चीस व्यक्ति उत्तमोत्तम परिच्छद परिधान किए,पाहराए। उनलोगों के मध्य में एक बहुमूल्य वस्त्राभरण से अलकृत सभ्रान्त युवक चले आतेथे। उन लोगों कोआते देखकर महाराज अश्व से अवतीर्ण हुए और अपनी उत्कर्षता दिखाने के लिये अनेक व्यक्तियों ने महाराज के अश्व को थाम लिया।

आगतुक लोगों मे से एक व्यक्ति ने महाराज को अभिवादन करके कहा,-"महाराज! ये शाहनशाह दिल्ली के शाहजादे हैं। इनका नाम शाहजादे मुहम्मद है।"

श्रवणमात्र ही से महाराज और शाहजादे महामोद के सङ्ग गले गले मिले और यथायोग्य प्रेम-संभालण करना आरम्भ किया।

महाराज,--"आपके दर्शन की बड़ो अभिलाषा थी, सौभाग्यों से आज यह प्राप्त हुआ।"

शाहजादा,--"जी नहीं, मैं किस लायक हूँ! मगर हां, आपकी मुलाकात से मेरा दिल निहायत शाद हुआ,यह कहना लाज़िम है।"