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(६०)
[बारहवां
मल्लिकादेवी।

हो तो। मुझे क्यों ढकेलती है !"

मल्लिका,--"सरला ! आज तुझे कैसी कैसी बातें सूझती हैं ?"

सरला,--"वैसी, जो तेरे मन में हैं !

मल्लिका,--"चल, वाह ! मेरे मन में क्या है ? झूठा कलङ्क न लगा!!!"

सरला,--" बाह री, गङ्गाजल! तो, ले मुझे क्या पड़ी है, जो व्यर्थ अपने प्राण दूं! मल्लिका! अपने चाद से भेट न करेगी ?"

मलिका,--'तू मरे तो मैं बचू। '

सरला,-'"मेरे मरने से.तू प्रसन्न होगी ?"

मल्लिका,--"नही !"

सरला,--"फिर मुझे कोसती क्यों है ! अच्छा, जो मैं मरही गई तो तू क्या करेगी?"

मल्लका,--"कोने में बैठकर ' हायसखी ! ' कहकर अच्छी तरह रोऊगी।"

सरला,--"तो फिर कोसती क्यों है।"

तब तो--"झखमारा"-कहकर मल्लिकासरला के गले से लपटकर हँसने लगी । सरला के स्नेहोद्रेक की सीमा न रहो । हास्यधुनि उसका मुख विदोण करके निकल पड़ी।

सरला ने उसका मुख्न चुंबन करके हाथ थाम कर कहा.- "देखो, सखी ! जो महाराज से मिलना हो तो चुपचाप जागती रहना, मैं आधी रात के समय उन्हें सङ्ग लेकर आऊगी।"

मल्लिका ने भ्र भङ्गो और नेत्र सञ्चालन तथा ग्रीवा घुमाकर कहा,-"अरी! मुझे किमीसे क्या काम है ?"

सरला जन्म से मल्लिका के संग थी, और मल्लिका को सरला कैसा चाहती थी, यह भी पूर्णरूप से प्रकट होता जायगा, तब सरला जो मल्लिका के हदय से अभिज्ञ थी, इसमे का संदेह है ?

उसने छल से कहा,--"मल्लिका! तेरे ही लिये मैं प्राण देती हूं और इसना प्रबन्ध कर रही हूं; पर तू ही जय इन बातो से अनिच्छा प्रकाश करती है, तो मुझे क्या पड़ी है, जो मैं ब्यथं माथा खाली फर्क ? ले, अब मैं न जाऊगी।"

सरला मल्लिका का कोमल हदय जानती थी। उसने मल्लिका के हद्गत भाव के जानने के लिये इस प्रकार ये वचन कहे थे और