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(३०)
[पांचवा
मल्लिकादेवी।

सूर्यनारायण अधिक यात्रा के श्रम से परिश्रान्त होकर रात्रियापन के लिये अस्ताचल के ऊपरशयनमंदिर में पधारे। उनकी हृदयहारिणी सरोजिनी प्राणपति के वियोग में अतिशय कातर होकर दिननाथ के नैशवियोग को न सह सकी। उसने एकबार उन्नत मुख करके करुण कटाक्ष किया, पर 'प्रामप्यारे न फिरे यह देखकर वह मान और लज्जा से संकुचित होगई। इधर कुमुदिनी दिनभर के वियोग में महामलिन हो रही थी, सो निशापति के आगमन की बात सुनकरहर्ष से प्रफुल्लित हुई।

महाकामी निशाकर दिनभर दिनमणि के भय से घर के बाहर नहीं निकले थे, उन्हें अस्तमित होते देखकर वे प्राची दिशो से मुख निकाल और इधर उधर देखकर गगनप्राङ्गण में अर्द्धकला विस्तार करते करते उदय हुए, और उन्होंने अपनी शीतल कौमुदी से जगतीतल को रौप्यवर्ण कर दिया।

पक्षीकुल निशागमन के पूर्व ही निज निज कोटरों में प्रवेश करके सो रहे थे, पशुकुल भी इधर उधर तरुच्छाया में रात्रियापन करने लगे थे, और एक प्रकार बन में शान्ति फैली हुई थी।

धीरे धीरे रात्रि हुई। दोनों बंधु जिधर से आए थे, उस मार्ग को न पाकर और रात्रि का आगमन देखकर कुछ मन ही मन उद्विग्न हुए। भला! रात्रि के समय सधन बन में मार्ग का पता कब लग सकता है ? बन भी सघन, तरुलतामों से पूर्ण और बीहड़ था। पड़े बड़े महीरुह ऊचा सिर किए मानों पथिकों को अपनी शाखा हिलाकर इस बन में प्रवेश करने का निषेध करते थे। उस पन में चद्रिका माला के आने की शक्ति नहीं थी।ठहर ठहर कर भयकर प्राणघाती निशाचर पशुओं के चीत्कार से हत्कंप होता था और विस्तीर्ण बन में केवल दो मनुष्य थे।

दोनों बंधुओं ने साहस पर निर्भरहो, एक ऊंचे वृक्ष पर आरोहण करके देखा तो चंद्रालोक में थोड़ी दूर पर एक गिरिगुहा देख पड़ी। उस निस्सीम बन में घोर रजनी के समयपक आश्रय पाफर दोनों के चित्त में आशा का उदय हुआ।वृक्ष से शीघ्र उतर कर वेदोनोंगुहा की ओर गए और उसे भली भांति देखा कि दरी भीतर से प्रशस्त और निरापद थी और उसमें जीव-जंतु का कोई भय नहीं था।

यह जान कर उसीमें रात्रियापन का संकल्प करके महाराज ने कहा,- "मित्र! यहीं किसी प्रकार रात्रियापन करना चाहिए।"