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(२२)
[तीसरा
मल्लिकादेवी।

युवती,--"महाराज! प्रातःकाल हुआ। कहिप, रात आनन्द से कटी, तो?"

युवक.-"जहां तुम जैसी आनंद देगेनाली हो, वहां आनंद की क्या कमी है ?

सुंदरी,-" सखी ने आपका आदर-सत्कार उत्तम किया न!"

युवक,-" जैसी सरस तुम हो, तुम्हारी सनी तुमसे भी अधिक है। यह सुन बालिका लजित होकर वहांसे भाग गई।

युवती ने कहा,-" महाराज ! यदि माशा हो तो कुछ पूर्छ ।”

युवक,-" तुम जो चाहो, सो पूछलो, और अपना परिचय न दो, क्या यही न्याय है ! "

संदरी,-"स्त्रीजाति न्याय क्या जानै !" ।

युवक,-"तो कैसे व्यबहार चलेगा?"

सुदरी,-"शान्त होइए, फिर भेंट होने पर मैं सब रहस्य कहूंगी। कहती अभी, पर क्या करू, पराधीन हूं।"

युवक,-" तो अपना नाम तो बताओ।"

सुंदरी,-"इसमें क्षति क्या है ! दासी को सय कोई 'सरला' कहते हैं।"

युवक,-"यथार्थ कहते हैं, यथा नाम तथा गुण!!!

सरला,- महाराज ! आपने किसी सुन्दरी से विवाह किया है.

युवक,-"किया है।"

इतना सुनते ही सरला धम्म से पृथ्वी में बैठ गई, सहस्त्र वृश्चिक- दंशन से बढ़कर उसको दुःख हुआ और उसकी मुखाकृति बदल गई। उसका भाव समझकर युवा ने कहा,-"सरला! तुम घबराती क्यों हो ? हमारा विवाह तो तुम्हारे सामने हुआ है !

सरला,- "आपको शपथ है, सच कहिए।"

युवक,-"सचही कहते हैं। एक अज्ञातकुलशीला बाला के हाथ में हमने आत्मसमर्पण किया है।

सरला,-"कब ?"

युवक,-"इसी निशीश में।