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(१९)
दूसरा
मल्लिकादेवी।

युवा ने उसे देख कर कहा,--

"अहा! हमारे आने से आज आपको बहुत कष्ट हुआ। जबतक हमारे प्राण देह में रहेंगे, कृतज्ञताप्रकाश करने के लिये हम ढंढने पर भी कोई शब्द न पावेंगे। यदि कभी इस अधम शरीरसे कुछ भी भापका अपकार होसफा तो इस नश्वर देह को हम कृतकृत्य समझेगे।

युवती,--"आप मुझ सी तुच्छ दासी को बार बार "माप आप" कहकर लजित क्यों करते हैं ? मेरी इतनी योग्यता नहीं है कि आप जैसे महानुभावों से इस विशेषण की पात्री बनूं । "

युवक,--"तुम्हारी जैसी इच्छा, किन्तु आकार प्रकार और रीति व्यवहार से तो तुम कदापि दासी प्रतीत नहीं होती! पश्चात्ताप यही है, कि तुम कुछ अपना हाल कहती भी नही ! अल्तु ।

इतना कहकर युवक ने युवती के हाथ से जलबान लेकर मुंह हाथ धोया और उसमें से थाड़ा सा जल पो करके कंठ और हृदय को शीतल किया। फिर वह इस कठिन समय मे युवती के उस उपकार के लिये उसे मान्तरिक धन्यवाद देने लगा। क्षणभर के अनन्तर जलपात्र देने के लिये उसने मुंह फेरा तो वहां युवती नहीं दिखाई दी। युवक वहीं जलपात्र रखकर विश्राम का विचार कर रहा था कि उसके कानों में एकाएक अमृतधारा बरसने लगी। युवा ने सुना कि यगलवाली कोठरी में दो स्त्रिया धीरे धीरे कुछ बातें कर रही हैं। युवा ने उत्कंठित होकर उधर ही कान लगाया और इस प्रकार उन दोनों की बातें सुनने लगा,-

एक,--"हां! मुखाकृति और स्थर तो वैसा ही है, पर फिर भी सन्देह है।"

दूसरी,--"सरला! न जाने क्यों, इन्हें देखने से हदय में व्या का सञ्चार होता है।

एक,-" तुम्हारा दया का शरीर ही है !

दूसरी,--"क्यों, इन्हें भीतर बुलालेने में कोई हानि है ?

एक,--"जी चाहे, तुम्ही वहां जाकर उनसे मिल लो ! "

दूसरी,--"दुर! विचारे धूप, गरमी के सताए, यहां आए हैं। अतिथि की सेवा करनी क्या तेरे धर्मविरुद्ध है ! थोड़ी देर यहां विश्राम करके फिर जहां उनका जी चाहेगा, चले जायंगे । इसमें हानि क्या है?