पृष्ठ:मल्लिकादेवी.djvu/१२६

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( १२४) [चौथीसा हमारे दिए हुए राज्य को स्वीकार करै। और यदि कमी भीषह हमारा स्मरण करैगी तो हमारी आत्मा स्वर्ग में अनत सुख का अनुभव करेंगी। अधिक क्या कहैं.अब हमे नैराश्य परम सुखम्' प्राप्त हुआ। इतना कहत कहते नरेन्द्र का कठ रुद्ध हुआ और आंखों से बलवतो अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी। बे भग्नहदय हो वहांसे उठकर गमनोधत हुए। उनकी दशा देखकर सरला का सरल हृदय टुकड़े टुकड़े होगया, वह अञ्चलद्वारा अपना नेत्र मार्जित करके प्रकृतिस्थ हुई और नरेन्द्र का हाथ थाम कर कहने लगी,- "महाराज! शान्त होइए,मल्लिका आपही की है, किन्तु- ___ नरेन्द्र की बुद्धि चक्कर खाने लगी, और वे स्तभित होकर खड़े खड़े सरला का मुख देखने लगे। अनंतर उन्होंने आतुर होकर कहा,-"सरला! नहीं जान पडता कि तुम्हारा हृदय कितना गंभीर है और उसमें क्या क्या जजाल भरा हुआ है ! तुम्हारी बातों के तत्व तक पहुंचना नितान्त कठिन है।" सरला,-"महाराज!मल्लिको आपही की पक्षपातिनी है,किन्तु-" नरेन्द्र,-"हाय ! तुम क्या इस समय हमारे साथ परिहास करके और भी कटे पर नोन छिड़कती हौ ?" सरला,-"यह कैसे ?" नरेन्द्र,-"और क्या ? कभी मल्लिका की माशा छुडाती, और कभी आशा बंधाती हो । भई ! तुम्हारी बातों ने हमारे प्राण लेडाले । तुम इतनी बज्रहदया हो?" सरला,-"महाराज!न मैने परिहास किया, और न मिथ्या कहा, भाप व्यर्थ मुझ पर दोषारोप करते हैं !" नरेन्द्र,-"फिर वही बात!!! तुम्हारा जो आन्तरिक अभिप्राय हो, उसे सत्य सत्य कह डालो। सरला.-"अब कहूंगी, किन्तु आपसे एक अनुरोध है।" नरेन्द्र,-"आज हमारे पूरे दुर्भाग्य का उदय हुआ है और बड़े अपशकुन में हम घर से चले हैं, जिससे इसनी मर्मान्तिक यातना सहनी पड़ती है । अस्त, तुम्हारा अब कौनसा अनुरोध बाकी है ? यह भी कहो!" ___ सरला, "माप मलिका को पाबैगे, किन्तु-" . नरेन्द्र,-"फिर वही ढंग ?-"किन्तु" मा ?"