पृष्ठ:मरी-खाली की हाय.djvu/१८४

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(१७५)

जाओ—
आर्य रक्त और आर्य वंश का जब उद्दीपन होगा।
इसी अग्नि से अग्नि होत्र का तब आयोजन होगा।
श्वेतदर्प का विश्व व्याप्त आतंक जहाँ जो होगा।
अश्वमेध की आहूती में वह सब स्वाहा होगा।
उस प्रसंग पर अमन्त्रित होकर ही अब तुम आओ।
जाओ—
पूज्य पिता से शुभ असीस की सिर पर पाग बंधेगी।
भक्ति सती की नित्य तुम्हारा अक्षय कवच रचेगी।
मित्रों की कामना तुम्हारी रक्षा सैन्य बनेगी।
साठ करोड़ आँख निशि वासर तुम पर सदा रहेंगी।
भय क्या है? हर्षाते जाओ हँसते २ आओ।
जाओ—
वेदी के उतुङ्ग शिखर पर से फिर रंग दिखाना।
धारा वाह वाग्वाणों का विकट मेह बर्साना
मरें मनों को हरे बनाना जीतों को मस्ताना।
सदा गूँजती रहे एक ऐसी आवाज उठाना।
बही आन आने की है जब आओ उसे निबाहो।

जाओ

जाओ

जाओ