पृष्ठ:मरी-खाली की हाय.djvu/१६०

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( १५१ ) पर खड़े हो गये । तमाम कैदियों को अपने २ बारक में बन्द होने का हुक्म दे दिया। रास्तों और दर्वाजों की सफाई की जाने लागी। कुछ ही देर में पुलिस के उकचाधिकारी, मजिस्ट्रेट और जेल सुपरिन्टेन्डेन्ड की मोटरें जेल के फाटक पर आ लगीं। भू खा, नंगा, पागल और सर्वाङ्ग में क्षत विक्षत हरसरन बाहर निकाला गया। वह चल नहीं सकता था। दो सिपाही उसे सहारा देकर लाये । आफिस में आकर वह गिर गया। उसे होश में लाया गया। डाक्टर ने कुछ शक्ति बर्धक दवा दी। जेल सुपरिन्टेन्डेन्ट ने उसे कुर्सी पर बैठाया। धीरे २ होश में आकर उसने चारों ओर देखा। वह कुछ बड़ बड़ा रहा था। मजिस्ट्रेट ने पूछा-'क्या तुम सरकारी गवाह बन कर शाही क्षमा चाहते हो ?" "मैं मुखबिर बना चाहता हूँ । मुखबिर।" "क्या तुम बयान दे सकते हो ?" "तुम लोग क्या चाहते हो ?" "हम लोग तुम्हारा बयान लेना चाहते हैं ।" 'क्या तुम उसे फाँसी दे दोगे ?" "यह बात तो कानून के हाथ में है ।' "उसे फाँसी दे दो।" "तुम जो कुछ जानते हो सघ संच २ बयान कर दो।" "मुझे क्या मिलेगा ?"