पृष्ठ:मध्य हिंदी-व्याकरण.djvu/३९

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जैसे, "भाषा-बद्ध करब मैं सोई" "जो मैं ही कृतकार्य नहीं तो फिर और कौन हो सकता है?"

(आ) अपने से बड़े लोगों के साथ बोलने में अथवा देवता से प्रार्थना करने में; जैसे, "सारथी -- अब मैंने भी तपोवन के चिह्न देखे।" "ह० -- पितः, मैं सावधान हूँ।"

(इ) स्त्री अपने लिए बहुधा "मैं" का ही प्रयोग करती है; जैसे, "शकुंतला -- मैं सच्ची क्या कहूँ!" "रानी -- अरी! आज मैंने ऐसे बुरे बुरे सपने देखे हैं कि जब से सोके उठी हूँ, कलेजा काँप रहा है।"

९६ -- हम -- उत्तमपुरुष (बहुवचन)।

'लड़के' शब्द एक से अधिक लड़कों का सूचक है; परंतु 'हम' शब्द एक से अधिक मैं (बोलनेवालों) का सूचक नहीं है। ऐसी अवस्था में "हम" का अर्थ यही है कि वक्ता अपने साथियों की ओर से प्रतिनिधि होकर अपने तथा अपने साथियों के विचार एक-साथ प्रकट करता है।

(अ) संपादक और ग्रंथकार लोग अपने लिए बहुधा उत्तमपुरुष बहुवचन का प्रयोग करते हैं; जैसे, "हमने एक ही बात को दो दो तीन तीन तरह से लिखा है।" "हम पहले भाग के आरंभ में लिख आये हैं।"

(आ) बड़े बड़े अधिकारी और राजा, महाराजा; जैसे, "इस- लिए अब हम इश्तहार देते हैं।" "नारद -- यही तो हम भी कहते हैं।" "दुष्यंत -- तुम्हारे देखने ही से हमारा सत्कार हो गया।"