पृष्ठ:मध्यकालीन भारतीय संस्कृति.djvu/९६

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हर्ष ( ५१ ) रहते थे। खाने, पीने, सोने, बैठने, अतिथियों के रहने, संगीत, वाद्य आदि के लिये भिन्न भिन्न कमरे होते थे। कमरों में वायु संचार के लिये अच्छा प्रबंध रहता था। शहर के सामाजिक जीवन को आनंदमय बनाने के लिये समय समय पर बड़े बड़े मेले हुआ करते थे, जहां लोग हजारों की तादाद में सम्मिलित होते थे के समय हुएन्त्संग ने प्रति पाँचवें वर्ष होनेवाले धर्म-सम्मेलन का वर्णन किया है, जिसमें हर्ष भिक्षुकों को दान दिया करता था। इसके अतिरिक्त अन्य शुभावसरों पर भिन्न भिन्न स्थानों में भी मेले हुआ करते थे। ऐसे धार्मिक मेले केवल आनंद के लिये नहीं होते थे, परंतु आर्थिक दृष्टि से भी इनका महत्त्व बहुत था । इन मेलों में से व्यापारी आते थे और सामान खरीद फरोख्त होता था। मेलों की यह प्रथा आज भी भारत में विद्यमान है। इन मन्नों में समारोह वहुत होता था। बहुत से त्यौहारों के अवसरों पर भी मले किए जाते थे, जैसा कि रत्नावली में वसंतोत्सव के उल्लेख से पाया जाता है। हिंदुओं में त्यौहारों का प्राधान्य है, वे उन्हें बहुत समारोह से मनाते थे। इन मेलों का हिंदुओं के सामाजिक जीवन में बहुत भाग था। होली के उत्सव में पिचकारी द्वारा रंग फेंकने का भी रिवाज था, जैसा कि हर्ष ने रत्नावली में वर्णन किया है। लोगों के दिल बहलाने के लिये नाटक-गृह या प्रेक्षागृहों का उल्लेख भी मिलता है। इसी तरह गान-भवनों, चित्रशालाओं आदि का भी वर्णन मिलता है, जिनमें नागरिक जाकर आनंद करते थे। नाटक, नृत्य, संगीत प्रार चित्रकला का विकास कितना हो चुका था, इस पर आगे प्रकाश डान्दा

धारायंत्रविमुक्तसंततपयः पूरप्लुते सर्पतः । सधः सांगविमर्दकर्दमहतनीडे रुपां प्रांगणे ॥ ६ ॥ रलावली; अंक। +राधाकुमुद मुकर्जी; हर्ष, पृ० ६७५---७६ ।