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मतिराम-सतसई


बाल अलप जीवन भई, ग्रीषम सरित सरूप ।
अब रस परिपूरन करौ, तुम घनस्याम अनूप ॥६७७।।
मुख बिधु छिन-छिन यों रहै, एक द्यौस ही माँझ ।
पून्यो हुती प्रभात अब, होति अमावस साँझ ॥६७८।।
कहा कहे रूखे बचन, सातिक भाव अपार ।
तरुनि छपायो चहति तू, तिन की ओट पहार ॥६७९।।
तेरी मृदु मुसिक्यानि लखि, सरद जोन्ह सम रंग।
बाढ़त मोद पयोधि कें, दृगनि तरंग उतंग ॥६८०॥
अँसुवनि सों छाए रहै, लाल बाल के नैन ।
तब तें तो दरसन छुट्यो, तब तें कछ लखै न ॥६८१॥
बाल गहति दसननि लसत, लाल अधर बर बिंब ।
मनो दसन अरबिंद है, सरद इंदु कौ बिंब ।।६८२।।
सखि छपाव यह भाव अब, चाहत भयो जनाउ ।
अँखिया में उर की उमगि, रह्यो तनीन तनाउ ॥६८३।।
अंजन जुत अँसुवा ढरत, लोचन मीन समान ।
लसत नीलमनि दंड जुत, मनो मनोज निसान ॥६८४॥
सेतु बिंदु चंदन सहित, गिरत नाल तें टूटि ।
बिधु उर तें जनु बिधु बधू, परति भानु कर छूटि ॥६८५।।
जाके बर बरजोर यह, करत सकल तन ऐ
 मनो मनोज की, तिरछी चारु चितौनि ॥६८६।।
डीठि परस्पर दुहुनि की, दई बदन जनु चैन।
तिय मुख में पिय नैन हैं, पिय मुख में तिय नैन ॥६८७॥


छं० नं० ६७७ भावार्थ-हे घनश्याम (कृष्ण-मेघ) ग्रीष्म ऋतू की नदी के समान वह बाल अल्प जीवन (प्राण-जल) हो रही है, उसको तुम अब रस (रस-जल) से परिपूर्ण करो।