पृष्ठ:मतिराम-ग्रंथावली.djvu/४९३

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मतिराम-सतसई ४८९ कासों जाति बखानि है, आँब-कली रस चित्त । बिसरायो जिहिं जाति तें, चंचरीक को चित्त ॥५७०॥ लीनो रस कोकिल कुलनि, आँब-कली को झारि । तासों मन मान्यो मधुप, सुमना सुमन बिसारि ॥५७१॥ बहु नाइक सों बावरी, मधुर बचन मुख बोलि। उतरि जाइगौ रूप मद, कटुक बचन मुख बोलि ॥५७२।। कियौ कंत चित चलन कों, तिय हिय भयौ बिषाद । बोल्यो चरनायुध सु तौ, भयो नखायुध नाद ॥५७३।। फूल कपोल मधक के, अधर बिंब फल रत्त । रस चाखत पिय बुद्धि बन, क्यों न होइ उनमत्त ॥५७४।। निरचि तरनि कर निकर कौ, अरु बरनत आलोक । होत प्रफुल्लित सोक तजि, सकल कोकनद कोक ॥५७५।। पिया अलोकनि मैं निरखि, पीक अरुन बर जोति । तन दीपति दिन दीप सब, सब सौतिनि ही होति ।५७६।। बसन हरयो पिय सरत में, तिय तन जोति समीप । केलि-भौन में राति ह, भए द्यौस के दीप ॥५७७॥ अटा ओर नँदलाल उत, निरखौ नेक निसंक । चपला चपलाई तजी, चंदा तजो कलंक ॥५७८॥ पिय मुख पंकज में परे, तिय-दृग-मधुप उड़ाइ। अरुन भए रस पान बस, राग पराग लगाइ ॥५७९॥ आनँद आँसुन सों रहैं, लोचन पूरि रसाल । दीनी मानहु लाज कों, जल अंजुलि बर बाल ॥५८०।। बिरह अनल कुमुदिनि हियें, डारयो जोन्ह बुझाइ । कुमुदिनि तें मनो धम रुचि, अलि-कूल चले उडाइ॥५८१॥ छं० नं० ५७१ सुमना=मालती। छं० नं० ५७३ चरनायुध= मुरग़ा। नखायुध=नृसिंह । छं० नं० ५७४ मधूक=महुआ।