पृष्ठ:मतिराम-ग्रंथावली.djvu/४८३

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

मतिराम-सतसई ४७९ बरनत भौंह कमान जुत, बरनत बैन बनै न । सरल-सरल सत मदन के, तरल-तरलतर बैन ॥४६२।। तेरी मूरत जुत लिखी, निज सूरति लखि बाल । धनि मानति मन भाँवती, निज तनु तें नंदलाल ॥४६३।। तची न तो औगुननि सों, रची न तो अनुराग। ब्रज में देहु बताइ कै, ऐसी तिया सभाग ॥४६४।। बिहसि बढ़ायो लाल तुम, तिय हिय में अनुराग । बिफल क्यों न दुख देत ज्यों, आप लगायो बाग ॥४६५॥ निसा समैं अरबिंद रुचि, द्यौस इंदु की ज्योति । बाल-बदन छबि तो बिरह, लाल कहा धौं होति ॥४६६।। चली सहेटनि कुंज कों, धरि सित भूषन चीर । जोन्ह बीच अंबुजमुखी, भई कंबु की छीर ॥४६७॥ मेरे मन तो बसति है, नैन कियो अपराध । तुम्हें दोस को देतु है, है यह काम असाध ॥४६८।। जमुना तट वा कुंज में, तुम जु दई ही माल । निकसति जीवहिं बाँधि के, तासों राखति बाल ॥४६९।।* जिन चलाइयै चलन की, चरचा स्याम सुजान। हों देखति हों वाहि यहिं, बात सुनत बिन प्रान ॥४७०॥ नैननि कौ आनंद है, जिय की जीवनि . जानि । प्रगट दरप कंदरप कौ, तेरी मृदु मुसिक्यानि ॥४७१।। छं० नं० ४६७ कंबु को छीर=चाँदनी में सफ़ेद कपड़े और आभूषण पहने नायिका ऐसी जान पड़ती थी मानो सफ़ेद शंख में दूध झलक रहा हो।

  • दे० ललितललाम उ० उपलक्षण उदात्त ।

+दे० ललितललाम उ० भाविक। दे० ललितललाम उ० हेतु ।