पृष्ठ:मतिराम-ग्रंथावली.djvu/४७६

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मतिराम-ग्रंथावली

न ४७२ मतिराम-ग्रंथावली औरै कछु चितवनि चलनि, औरै मृदु मुसकानि । औरै कछ सुख देत हैं, सके न बैन बखानि ॥४०४॥* जो निसि-दिन सेवन करै, अरु जौ करै बिरोध । तिन्हैं परमपद देत प्रभ, कहौ कौन यह बोध ॥४०५॥ लखो लाल तुमकों लखै', ए बिलास सरसात । बिहसत ललित कपोल हैं, मधुर नैन मुसिक्यात ॥४०६॥ पगी प्रेम नंदलाल के, हमे न भावत जोग । मधुप राजपद पाइ कै, भीख न माँगत लोग ॥४०७॥x मधुप त्रिभंगी हम तजी, प्रगट परम करि प्रीति । प्रगट करी सम जगत में, कट कुटिलनि की रीति ॥४०८॥+ हरिमुख लखि लोचन सखी, सुख में करति बिनोद । प्रगट करत कुबलयनि कौ, चद्रोदय तें मोद ॥४०९॥ बिषयनि तें निरबेदबर, ज्ञान जोग ब्रत नेम। बिफल जानियों ए बिना, प्रभु पग पंकज प्रेम ॥४१०॥= देखत दीपति दीप की, देत प्रान अरु देह । राजत एक पतंग में, बिना कपट को नेह ।।४११।- १ लखत, २ यों। छं० नं० ४०५. इस दोहे का 'मतिराम-सतसई' में दो बार प्रयोग हुआ है।

  • दे० ललितललाम भेदकातिशयोक्ति ।

+दे० ललितललोम तुल्ययोगिता ।

  • दे० ललितललाम उ० शब्दावृत्तिदीपक ।

x दे० ललितललाम उ० दष्टांत । +दे० ललितललाम उ० निदर्शना । =दे० ललितललाम उ० विनोक्ति । -दे० ललितललाम उ० विनोक्ति ।