पृष्ठ:मतिराम-ग्रंथावली.djvu/४३९

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।
४३५
मतिराम-सतसई

. .. ....... . . मतिराम-सतसई ४३५ FFERENCE भाल लाल बेंदी दिए, उठे प्रात अलसात । लोनी लाजनि गड़ि गई, लखे लोग मुसकात ॥४४॥ जोते पहिरे सुंदरी, सो, दुति अधिक उदोतु। तेरे सुबरन रूप तें, रूपो सुबरन होतु ॥४५॥ भजे अँध्यारी रैनि मैं, भयो मनोरथ काज। पूरे पूरब पुन्य तें, परयो परोपन आज ॥४६।। निज बल के परिमान तुम, तारे पतित बिसाल । कहा भयो जु न हौं तरतु, तुम न खिस्याहु गुपाल ॥४७॥ कर धरि काँधे कंत के, चलै लटपटी चाल । थकित करति पथिकनि सबनि, थकित पंथ में बाल ॥४८॥ नेकु न थाकत पंथ में, चले जु कोस हजार । चंचल लोइन-हयनि पर, भए जात असवार ॥४९॥ ललित नाक नथुनी बनी, चुनी रही ललचाइ । गजमुकतनि के बिच परयो, कहो कहाँ मन जाइ ॥५०॥ झूठे ही ब्रज में लग्यो, मोहिं कलंक गुपाल। सपने हूँ कब हूँ हिए, लगे न तुम नंदलाल ॥५१॥* चंद-किरनि लगि बाल तन, उठे अंग अति' जागि। परसत कर दिनकर किरनि ज्यों दरपन में आगि ॥५२॥ | १ उठ आगि, २ दुपहर दिनकर करि परस । ' छं० नं० ४४ लोनी=सलोनी नायिका। छं० नं० ४६ परावन- पर्वन् =पर्व, उत्सव । छं० नं० ४७ हे ईश्वर, अपनी शक्ति-भर तुमने बड़े-बड़े पापी तार डाले हैं, क्या हुआ जो मुझे नहीं तार पाते हो इस कारण तुम शरमाओ नहीं। छं० नं० ४९ लोइन-हयनि नेत्र-तुरंग। .

  • दे० रसराज उ० मोट्टाइत-हाव ।

+ दे० रसराज उ० प्रौढ़ा प्रोषितपतिका ।