पृष्ठ:मतिराम-ग्रंथावली.djvu/४०२

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

SKRIT hintamr SHOCIATIONammeminis 25 a parvjaptinews ३९८ मतिराम-ग्रंथावली SCOPE भार4533051STORNO जाके एक-एक रोम कूपनि मैं कोटिन, अनंत ब्रह्मांडनि को वृद बिलसत है ; राव भावसिंह तेरी कहाँ लौं बड़ाई करौं, ऐसो बड़ो प्रभु तेरे मन में बसत है ।। २३९ ।। अल्प-लक्षण जहँ सूछम आधेय तें अति सूछम आधार । अलर अलंकृत कहत हैं कबिजन बुद्धि उदार ॥ २४० ॥ उदाहरण मन जद्यपि अनुरूप है तऊ न छूटति संक। टूटि परै जनि भार ते निपट पातरी लंक ॥ २४१ ॥ ___परस्पर-लक्षण जहाँ परस्पर उपकरत, तहाँ परस्पर नाम । बरनत सब ग्रंथनि मते, कबि-कोबिद ‘मतिराम' ।। २४२ ॥ उदाहरण तुहि राखी सखि लाल करि निज उर की बनमाल। तै राख्यो करि लाल निज कंठमाल को लाल ॥ २४३ ॥ कब की हौं देखति चरित्र निज आँखिन सौं, राधिका रसीली स्याम रसिक रसाल के; 'मतिराम' बरनै दुहुँनि के मुदित अति, __ मन भए मीन-से अमृतमय ताल के। इकटक देखें लिए ब्रत-से निमेखनि के, नेम किए मानौं पूरे प्रेम प्रतिपाल के ; छं० न० २४१ भार-यद्यपि मन भी कटि के समान सूक्ष्म है फिर भी यह शंका लगी ही रहती है कि मन के भार से बिलकुल पतली कमर कहीं टूट न जाय; क्योंकि मन ४० सेर के भारवाले मन नाम के समान ही है।