है। प्राचीन कवियों में देवजी ने तथा आधुनिक कवियों में सरदारजी ने इस विषय पर कुछ विशेष विवेचना की है। उसका सारांश इस प्रकार है―
देवजी का मत
काव्य-शास्त्र में वर्णित नौ रसों में श्रृंगार, वीर और शांत मुख्य हैं। श्रृंगार और हास्य परस्पर मित्र रस हैं। इनका वर्णन साथ-साथ होने से रस-सौंदर्य में वृद्धि होती है। भयानक और श्रृंगार परस्पर विरोधी रस हैं। इनका वर्णन एक साथ न होना चाहिए; परंतु यदि आलंबन-विभाव भिन्न-भिन्न हों, तो ऐसा वर्णन किया जा सकता है। साहित्य-दर्पण के सप्तम परिच्छेद में यह विषय भली भाँति प्रतिपादित हुआ है। भयानक और श्रृंगार का इस दशा में जो वर्णन होगा, वह क्षम्य है। इस प्रकार से श्रृंगार, हास्य और भयानक इन तीन रसों का वर्णन साथ-साथ हो सकता है। वीर-रस के साथ करुण और रौद्र-रस के व्यवहार में काव्य-शास्त्र किसी प्रकार का दोषारोपण नहीं करता, इसलिये वीर, रौद्र और करुण-रस का भी वर्णन साथ-साथ हो सकता है। इसी प्रकार शांत, अद्भुत और बीभत्स-रस का भी साथ-साथ वर्णन हो सकता है। सारांश यह कि मुख्य श्रृंगार-रस के साथ हास्य और भयानक का तथा वीर के साथ रौद्र और करुण का एवं शांत के साथ अद्भुत और बीभत्स का वर्णन हो सकता है। अब देखना यह है कि क्या श्रृंगार के साथ वीर और शांत का वर्णन हो सकता है? देवजी की राय है कि विशेष-विशेष अवस्थाओं में ऐसा वर्णन हो सकता है। साहित्य-दर्पणकार कविराज विश्वनाथ ने भी इस मत का समर्थन किया है। वीर और श्रृंगार का यदि एक ही आलंबन हो, तो वे अवश्य विरोधी हैं, और उनका साथ-साथ वर्णन नहीं हो सकता, परंतु यदि आलंबन दूसरे-दूसरे हों, तो इन दोनो रसों का साथ-साथ वर्णन हो सकता है। एक उदाहरण