पृष्ठ:मतिराम-ग्रंथावली.djvu/३५३

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ललितललाम

ललितललाम ३४९ महलनि ऊपर'. जहं बने कंचन-कलस अनूप । निज प्रभानि सौं करत हैं गगन पीत अपनुरू॥९॥ जहँ बिमान-बनितान के, स्रमजल हरत अनूप । सौध-पताकनि के बसन, होइ बिजन अनुरूप ॥१०॥ बीनाबेनु-निनाद मृग मोहि, अचल कर चंद । सौध-सिखर ऊपर जहाँ, दंपति करत अनंद ॥ ११ ॥ जहाँ छहौं ऋतु मैं मधुर सूनि मृदंग मृदू सोर। संग ललित ललनानि के, नत्य करत गृह मोर ॥१२॥ मरकत, लाल, प्रबाल, मनि, मुकुत, हीर अवदात। ललित राजपथ मैं जहाँ, जरकस बसन बिकात ।। १३ ।। मद जल बरषत भूमि के जलधर सम मातंग । बिना परनि के खग जहाँ सुंदर तरलि तरंग ॥ १४ ॥ सदा प्रफुल्लित फलित जहँ द्रुम बेलिन के बाग। अलि कोकिल कलधुनि सुनत, लहत स्रवन अनुराग ॥१५॥ कमल, कुमुद, 'कुबलयन के परिमल मधुर पराग । सुरभि-सलिल पूरे जहाँ, बापी कूप तड़ाग ॥१६॥ सुक, चकोर, चातक, चुहिल , कोक, मत्त कलहंस । जहँ तरबर सरवरन के लसत ललित अवतंस ॥ १७ ॥ अक्षयबट बालक-उदर ज्यौं संसार समाय। सकल जगत-पानिप रह्यौ बूंदी मैं ठहरायः ॥१८॥ तामैं प्रतिबिंबित मनौं, संपतिजुत सुरलोक । घर- घर नर-नारी लसै दिब्य रूप के ओक ॥ १९ ॥ १ पीत गंग तल रूप, २ ऐसे, ३ चंचल, ४ सरस, ५ करत, ६ कुंद, ७ चडुल, ८ अमाय, ९ त्यों बूंदी मैं आय। - छं० नं० १० सौंध 'अनुरूप= महलों पर जो पताकाएं फहरा रही हैं वे पंखे का काम करती हैं । छं० नं० १३ जरकस=बहुमूल्य । छं० नं० १९ ओक=समूह ।