पृष्ठ:मतिराम-ग्रंथावली.djvu/३५२

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मतिराम-ग्रंथावली

ARALA । NAARI ३४८ मतिराम-ग्रंथावली सिद्धिबधू-कुच मंडन को मतिराम' मनौं मुकता ,मन मोहै; साधून को स बसी' करतार करी-मुखकेकर सीकर सोहै ॥४॥ मुकुट मोर-पर पुंज मंजु सुरधनुष बिराजत; पीत बसन छन-छन नवीन छन-छन छबि छाजत । बचन मधुर गंभीर घोष, बरषत प्रमोदबर; बूदाबन बर बाल-बेलिबदन बिलास कर। 'मतिराम' सकल संतापहर भावसिंह भूपाल-मन; गोबिंद नंदनंदन सुखद घन सुंदर आनंदघन ॥५॥ बूंदी-वर्णन जगत-बिदित बूंदीनगर, सुख संपति को धाम । कलिजुग हू में सत्यजुग, तहाँ करत बिस्राम ॥६॥ पढ़त सुनत मन दै निगम, आगम, समृति, पुरान। गीत-कबित्त कलानि को, तहँ सब लोग सजान ।। ७॥ सरद-बारिधर से लसत, अमल धौलहर धौल । चित्रनि-चित्रित सिखर जहँ, इंद्रधनुष-से नौल ॥८॥ १ सबसी, २ भर, ३ सब। पड़ते हैं मानों सिद्धि-बधू के उरोजों का श्रृंगार करनेवाले मोती हों अथवा अमृतसंयुक्त महादेवजी के शीश पर विराजमान चंद्रकला हो अथवा वहीं स्थित पापनाशिनी पवित्र गंगाजी हों अथवा पार्वतीजी के स्तन से जो दुग्ध-धारा प्रवाहित होती है उसकी समुज्ज्वल ज्योति जगमगा रही हो। छं० नं० ५ सुरवनुष=इंद्रधनुष । पीत बसन... छाजत=पीतांबर के भीतर से शरीर की शोभा प्रतिक्षण बिजली के समान छन-छनकर नवीनता लिए निकलती थी। घोष-शब्द । घन सुंदर=मेघ के समान सुंदर । आनंद-घन=कृष्ण । छं० नं० ७ समृति= स्मृति, धर्मग्रंथ । छं० नं० ८ सरद-बारिधर शरत्काल के मेघ । धौल- धवल-स्वेत । नौल-नवल-सुंदर।