पृष्ठ:मतिराम-ग्रंथावली.djvu/३१३

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

रसराज ३०९ न कबि 'मतिराम' निति उठि कलकानि करो, नित झूठी सौंहैं करो, नित बिसराइए; ताके पग लागो निस जागि जाके उर लागे', मेरे पग लागि उर आगि न लगाइए ॥२५४॥ निलज नैन कुलटानि के आनि बसे ब्रजराज। हिए तिहारे तें सकल मारि निकारी लाज ॥२५५॥ उपपति और वैशिक नायक-लक्षण जो परनारिन को रसिक, उपपति ताहि बखानि । प्रीति करै गनिकान सौ, बैसिक ताकौं जानि ॥२५६॥ उपपति-उदाहण सुंदरि सरस सब अंगन सिँगार साजे, सहज सुभाव निसि नेह कछु के गई; कीने 'मतिराम' बिहसौंहैं-से कपोल गोल, बोलन अमोल इतनोंई दुख दै गई। मेरे ललचोंहैं मुख फेरि के लजौहैं, ललचोंहैं चारु चखनि चितै कै सो चली गई; निपट निकट है के कपट छुवाय अंग, ‘लाय की-सी लपटि लपेटि मनु लै गई ॥२५७॥ नैन जोरि, मुख मोरि, हँसि, नैसुक नेह जनाय । आगि लेन आई हियै मेरे, गई लगाय ॥२५८॥ PAREVEADESH १ निज जाके उर लागे लाल, २ पीतम जो गनिकान को, ३ मेरे ललचौहें चाहि चष मुख फेरि के लजौहैं, ललचाहैं चारु चखन चितै गई। छं० न० २५४ कलकानिदुख और हैरानी की बात । सौंहैं = - क़समें । छं० नं० २५७ लाय=आग। छं० नं० २५८ आगि गई लगाय=नायिका आग माँगने आई थी पर यहाँ प्रेम की आग जला गई।