पृष्ठ:मतिराम-ग्रंथावली.djvu/३११

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

रसराज ३०७ सपने हूं मनभावतो करत नहीं अपराध । मेरे मन ही मैं रही, सखी! मान की साध ।।२४६॥ दक्षिण-नायक-लक्षण एक भाँति सब तियन सौं जाको होय सनेह । सो दच्छिन 'मतिराम' कहि बरनत हैं मतिगेह ।।२४७॥ उदाहरण साँझ समय ललना मिलि आई खरो जहाँ नंदलला अलबेलो; खेलन कौं निसि चाँदनी माँहि बनै न मतो 'मतिराम' सुहेलो। आपनि-आपनि पौरि बताय के बोल कह्यो सिगरीनि नवेलो; त्यौं हँसि के ब्रजराज कह्यो अब आज हमारिहि पौरि मैं खेलो। २४८॥ दच्छिन-नायक एक तुम मन मोहन ब्रजचंद । फुलए ब्रज-बनितान के दृग-इंदीवर बृद ॥२४९॥ शठ-नायक-लक्षण

  • डरै करत अपराध नहिं', करै कपट की प्रीति ।

बचन-क्रिया मैं अति चतुर, सठ-नायक की रीति ॥२५०॥ Kareeyanade १ डरे करै अपराध ही। ___ छं० नं० २४६ मेरे मन ही मैं साध= मेरी इच्छ मान करने की थी पर वह मन में ही रही, कार्य में परिणत न हो सकी; क्योंकि नायक ने कभी अपराध ही न किया। छं० नं० २४८ पौरि=घर । छं० नं० २४९ इंदीवर=नीला-कमल । यह रात में फूलता है ।

  • यह दोहा बंबई वेंकटेश्वर-प्रेस की प्रति में अधिक है-

प्रिय बोलै अप्रिय करै निपट कपट-जुत होय; सठ-नायक तासों कहत, कबि-कोबिद सब कोय ।