पृष्ठ:मतिराम-ग्रंथावली.djvu/३०९

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रसराज ३०५ MERO ki नायक-लक्षण तरुण, सुघर, सुंदर सकल काम-कलानि प्रबीन ॥ नायक सो ‘मतिराम' कहि, कबित-गीत -रस-लीन ॥२३७॥ गुच्छनि के अवतंस लसैं सिर, पच्छन अच्छ किरीट बनायो; पल्लव लाल समेत छरी कर-पल्लव सौं ‘मतिराम' सुहायो । गुंजनि के उर मंजुल हार सुकुंजनि तें कढ़ि बाहर आयो; आज को रूप लखें नंदलाल को, आजहि नैननि को फल पायो । २३८॥ भरी भाँवरै साँवरे, रास रसिक रस जान । उनहीं मैं मति भ्रमति है, लै बोंडर को पान ॥२३९ पति आदि त्रिविद नायक-भेद-वर्णन पति, उपपति, बैसिक त्रिबिध, नायक-भेद बखानि । बिधि सौं ब्याह्यौ पति कह्यौ, कबि 'मतिराम' सुजान ॥२४०॥ पति-उदाहरण पाँव धरे दुलही जिहिं ठौर रहे ‘मतिराम' तहाँ दृग दीने; छोड़ि सखान के साथ को खोलिबो, बैठ रहे घर ही रस भीने । १ रीति, २ सिखि, ३ ब्रजराज, ४ आँखिन को फल आजुहि पायो। छं० नं० २३८ गुच्छनि के अवतंस फूल के गुच्छों का मुकुट । पच्छन अच्छ किरीट बनायो=परों का अच्छा किरीट बनाया। गुंजनि=धुंघची । कर-पल्लव हाथ । नैन नि को फल पायो नेत्र सफल हो गए। छं० नं० २३९ उनहीं मैं मति भ्रमति है, है बौंडर को पान=जिस प्रकार बवंडर में पड़ा हुआ पत्ता घूम-फिरकर बवंडर में ही चक्कर लगाया करता है वही दशा मति की हुई है। वह भी उन्हीं में भ्रमा करती है।