पृष्ठ:मतिराम-ग्रंथावली.djvu/३०७

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रसराज ३०३ 510 राति कहूँ रमि के मनभावन, आवन' प्रात प्रिया-घर कीनौं; देखत ही मुसकाय उठी चलि, आगे कै आदर के पुनि' लीनौं। मोहन के तन मैं 'मतिराम' दूकल सू नील निहारि नवीनौं; केसरि के रंग सों रँगि कै पट पीत यौं प्रीतम के कर दीनौं । २२९॥ पिय अपराध अनेक हूँ आँखिन हूँ लखि जाय। तिय इकंत हूँ कंत सौं, मानो करत लजाय ॥२३०॥ मध्यमा-नायिका-लक्षण पिय सौं हित तें हित करे, अनहित कीने मान । ' ताहि मध्यमा कहत हैं, कबि 'मतिराम' सुजान ॥२३१॥ आयो प्रानपति राति अनतें बिताय बैठी, भौंहन चढ़ाय रंगी सुंदरि सुहाग को; बातन बनाय परयौ प्यारी के चरन आय, - छल सौं छिपाई छल-छबि रति-दाग की। छूटि गयो मान लगी आपु ही संवारन कौं, खिरकी सुकबि ‘मतिराम' पिय-पाग की; . रिस ही के आँसू रस-आँसू भए आँखिन मैं, रोस' की ललाई सो ललाई अनुराग की ॥२३२॥ १ आगम, २ फिरि, ३ के, ४ निज, ५ मैं, ६ पगन, ७ दाम, ८ भरे आनंद के, ९ रोष । छं० नं० २२९ नील दुकूल नीला कपड़ा प्रायः स्त्रियाँ पहनती हैं। प्रीतम कृष्ण हैं, जो पीताम्बर धारण करते हैं इसलिए उनको केसर से रँगकर फिर पीतांबर दिया। छं० २०२३० इकंत=एकांत, अकेले में । छं० नं० २३२ रति-दाग रति के चिह्न। खिरकी =खिसके हुए पेंच । रिस ही के आँसू अनुराग की आँखों में क्रोध के कारण जो आँसू आ गए थे वे अब आनंदाश्रु हो गए और उसी प्रकार रोषवश जो आँखें लाल हो रही थीं वही अब प्रेमवश लाल हो गईं। ..