पृष्ठ:मतिराम-ग्रंथावली.djvu/३०६

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मतिराम ग्रंथावली

HOTO ३०२ मतिराम-ग्रंथावली भावते को सुनि आगम आनँद अंगन-अंगन मैं उलह्यो है'; सो हमहँ सी सखी सों दुराइए आली, कह्यो यह कौने कह्यो है। बैंच लिए सुख के अँसुवा यह, क्यों दुरिहै जु हियो उमह्यो है; , गाढ़ी भई कर की मुंदरी, अंगिया की तनीन तनाव गह्यो है। २२४॥ सुन्यो मायके तैं वहै आयो बाम्हनु कंत। कुसल बूझिबे के लिये, लीनो बोलि इकंत ॥२२५॥ ____सामान्या-आगतपतिका-उदाहरण नागर बिदेस में बिताय बहु द्योस आयो, नागरी के हिय मैं हुलासन की खान की; कबि 'मतिराम' अंक भरत मयंक-मुखी, नेह सरसाय मोही मति सुखदान की। सुबरन बोलि के बतावति है सुबरन, - हीरनि जनावति है छबि मुसकानि की; आँखिन तें आनंद के आँसू उमगाय प्यारी, प्यारे को दिवावति सुरति मुकतान की ॥२२६॥ फूली नागरि-कमलिनी, उड़िगे मित्र-मलिंद । आयो मित्र बिदेस तें, भयो सुदिन आनंद ॥२२७।। ____उत्तमा-नायिका-लक्षण पिय हित के अनहित करै, आप करै हित नारि । तहि उत्तमा नायका, कबिजन कहत बिचारि ॥२२८॥ १ अंग अनंगनि त अमह्यो है, २ हितू सों, ३ मिसहिं, ४ भौंहैं कीनी, ५ नित्त । V छं० नं० २२४ गाढ़ी हुई."तनाव गह्यो है हर्ष के मारे हाथ की उँगली में जो मुद्रिका थी वह खुब कस गई और कंचुकी के बंदों में भी तनाव आ गया है । छं० नं० २२६ सुबरन बोलि के बतावति है सुबरन= अच्छे वचन कहकर मानो सोने की बात कहती है । SAGAR