पृष्ठ:मतिराम-ग्रंथावली.djvu/३०३

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२९९
रसराज

रसराज २९९ परकीया-प्रवत्स्यत्प्रेयसी-उदाहरण मोहन लला को सुन्यो चलनि बिदेस भयो, बाल मोहनी को' चित निपट उचाट मैं; परी तलाबेली तन मन मैं छबीली राखै, छिति पर छिनकु, छिनक पाँव खाट मैं । प्रीतम नयन-कुबलयन कौ चंद घरी, एक मैं चलेगो ‘मतिराम' जिहि बाट मैं; नागरि नवेली रूप आगरि अकेली रीति, गागरी लै ठाढ़ी भई बाट ही के घाट मैं ॥२१२॥ चलत सुन्यो परदेस कौं हियरा रह्यो न ठौर। .. लै मालिनि मीतहिं दयो नव रसाल को मौर ॥२१३॥ सामान्या-प्रवत्स्यत्प्रेयसी-उदाहरण मंजन कियो न तन, अंजन दियो न नैन, . जावक दियो न पाइ, रही मनु मारि कैं; 'मतिराम' सुकबि तमोल छोड़ि बैठी बाल', __पहिरे बसन डारे भूषन उतारि कैं। ऐहैं आजु पीय बिदा माँगन बिदेस कौं यौं, नेह के जनाइबे की चातुरी बिचारि कैं; १ मोहनी को चारु, २ तमोल तेल छाँड़ि बैठी। छं० नं० २१२ रीति= (खाली) गगरी का यात्रा-समय मिलना अशुभ है इससे यात्रा रोक दी जाती है। छं० नं० २१३ हियरा रह्यो न ठौर हृदय बेकाबू हो गया । मौर=बौर । मालिनि ने आम के बौर की भेंट करके नायक को वसंत की सुध दिला दी और उसीके साथ पंचशर के एक शर को सामने पेश करके उसे यात्रा न करने के लिये इशारा किया।