पृष्ठ:मतिराम-ग्रंथावली.djvu/२५३

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२४९ समीक्षा २४९ बान अरजुन को बखान 'मतिराम' कबि. गदा भीमसेन की सदा ही जस-काज की; बासव को बज्र, बासुदेवजू को चक्र, बलदेव को मुसल सदा कीरति है लाज की। दंड दंडधर को अदंडन के दंडिबे को, नखन की पाँति नरसिंह सिरताज की संभु को त्रिसूल, संभु-सिस्य को कुठार, . संभु-सुत को सकति, समसेर सिवराज की ॥ २ ॥ कबि 'मतिराम' कहै, रति ते अनूप बनी, ___ रूप धरे राज मानौ कोकन को कारिका; धार सुने बार-बार नीर भरि आवतु है, - नीरज की आँखिन नलिन-ऐसी तारिका । आगरे-दिली में छत्रसाल तेरी धाकनि तें, ___ आयो-आयो बोलत मुखन सुक-सारिका; चौंकि चलि सकें न चरन जुगलनि लाल, गुलनि के रंग मुगुलनि की कुमारिका ॥ ३ ॥