पृष्ठ:मतिराम-ग्रंथावली.djvu/२३१

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। समीक्षा २२७ सहज सिकार खेले पुहुमि पहार पति , भार रहौ यत्न गढ़ ढार सों लपटिक ; कहै 'मतिराम' नाद सुनत नगारन की , नगन के गढ़पति गढ़ से निकरिकै । सोहै दल - बृद में गयंद पर ग्यानचंद , बखतबिलंद रही सोभा ऐसी बढ़िक ; मेरे जान मेघन के ऊपर अमारी कसि , मघवा मही को सुख लेन आयो चढ़िकें । कुमायूं-नरेश उदोतचंद इनका बड़ा आदर करते थे। इनकी प्रशंसा में मतिरामजी ने बड़े अच्छे-अच्छे छंद रचे हैं । एक छंद नीचे दिया जाता है- 'पूरन पुरुष के परम दृग दोऊ जानि कहन पुरान-बेद बानी यों ररति गई; कबि मतिराम' दिनपति औ' निसा-पति यों दुहुन की कीरति दिसान माँझ मढ़ि गई। रबि के करन भए एक महादानि यह , जानि जिय, आनि चिता चित माँझ चढ़ि गई , तोहि राज बैठत कुमायूँ श्रीउदोतचंद , - चंद्रमा की करक करेजे हूँ ते बढ़ि गई।" सूर्य और चंद्र की प्रसिद्धि बराबर चली आती थी । सूर्य के कर्ण- जैसा दान-वीर तनय उत्पन्न हुआ। इससे उसका यश चंद्रमा से बढ़ गया। चंद्रमा के वैसा योग्य पुत्र न था। इससे उसे यह बात सदा खटका करती थी, पर जब उदोतचंद कुमायूँ के राजसिंहासन पर बैठे, तो चंद्रमा के कलेजे की वह कड़क मिट गई, क्योंकि कर्ण के समान दानी पुत्र उसे भी मिल गया, अब वह भी सूर्य के बराबर हो गया; कैसी सरस और चातुर्य से भरी उक्ति है ! यही उदोतचंद एक बार