पृष्ठ:भ्रमरगीत-सार.djvu/८

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पद संयोग-शृंगार का भी चिपका रह गया। पुस्तक का अधिक प्रचार हुआ और शुक्लजी के जीवनकाल में ही इसकी कई आवृत्तियाँ हो गईं। न तो प्रकाशक को पुनरावृत्ति रोक रखने का अवकाश मिला और न संपादक को उसकी पुनरावृत्ति करने का। फलस्वरूप पुस्तक प्रायः ज्यों की त्यों छपती रही। केवल थोड़ी सी छापे की वे अव्यवस्थाएँ दूर कर दी गईं जो पहली आवृत्ति होते ही ज्ञात हो गई थीं। अतः शुक्लजी जैसा चाहते थे वैसा परिष्कार करने की बारी ही नहीं आई।

काशी-हिंदू-विश्वविद्यालय में यह ग्रन्थ पढ़ाते समय मुझे शुक्लजी से कई स्थानों पर विचार-विमर्श करने का भी सुअवसर प्राप्त हो चुका है। प्रस्तुत आवृत्ति के समय जब प्रकाशक ने मुझसे इसके उपपादन का अनुरोध किया तो मैंने शुक्लजी की नीति के अनुकूल इसमें कुछ उलट-फेर करने का दुस्साहस भी किया। फेर-फार करने में जो विशेषता आ गई हो उसे स्वर्गीय शुक्लजी का प्रसाद और जो त्रुटि बन पड़ी हो उसे मेरा ही प्रमाद समझना चाहिए।

छानबीन करने से निम्नलिखित पद संयोग-शृंगार का दिखाई पड़ा। अतः इसे हटा देना पड़ा––

देखु री, हरि जू के नैनन की छबि।
यह अनुमान, मानि मन मानी अंबुज सेवत रबि॥
खंजरीट अतिब्यथा चपल भए, बन मृग, जल महँ मीन रहे दबि।
एते पै मानत न, कछू न कछू कहत हैं कुकबि॥
इन से तो एई हरि, आवै न कछु फबि।
सूरदास उपमा जु गई सब ज्यों होमत हबि॥

उद्धव-गोपी-संवाद के एक ही लंबे पद (संख्या ३७९) के छः टुकड़े हो गए थे और उनमें पृथक् पृथक् संख्याएँ लग गई थीं। ये संख्याएँ भी