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लंभ दशा के अश्रु और दीर्घ निश्वास के बीच-बीच में भी बराबर उसकी क्षणिक और क्षीण रेखा झलक जाती है। श्याम गोपियों के पास नहीं हैं; उनके सखा ही संयोग से उनके बीच आ फँसे हैं जो सदा उनके पास रहते हैं। बस यही संबंध-भावना कृष्ण के संदेश की विलक्षणता की भावना के साथ मिलते ही रह रहकर थोड़ी देर के लिए वृत्ति को विनोदमयी कर देती है––

ऊधो हम आज भई बड़भागी।
बिसरे सब दुख देखत तुमकों, स्यामसुन्दर हम लागीं।
ज्यों दर्पन मधि दृग निरखत जहँ हाथ तहाँ नहिं जाई।
त्यों ही सूर हम मिलो साँवरे बिरह-बिथा बिसराई॥

मध्यस्थ द्वारा संयोग-सूत्र का कैसा सुंदर स्पष्टीकरण सूर ने किया है! जो संबंध-भावना बीच बीच में गोपियों की वृत्ति विनोदमयी कर देती है वह कभी कभी स्पष्ट शब्दों में निर्दिष्ट होकर सामने आ जाती है और पाठक उसे पहचान सकते हैं; जैसे––

मधुकर! जानत है सब कोऊ।
जैसे तुम औ मीत तुम्हारे, गुननि निपुन हौ दोऊ॥
पाके चोर, हृदय के कपटी, तुम कारे औ बोऊ।

उद्धव को जो 'पक्के चोर और कपटी' प्रेम के ये संबोधन "मिल रहे हैं वह कृष्ण के संसर्ग के प्रसाद से।

ऐसेई जन दूत कहावत।
ऐसी परकृति परति छाहँ की जुबतिन जोग बुझावत॥

गोपियाँ कहती हैं कि बैठे बैठे योग और ज्ञान का संदेसा भेजनेवाले कैसे हैं यह हम अच्छी तरह जानती हैं––

हम तौ निपट अहीरि बाबरी जोग दीजिए ज्ञानिन।
कहा कथत मामी के आगे जानत नानी नानन॥