पृष्ठ:भ्रमरगीत-सार.djvu/५५

यह पृष्ठ प्रमाणित है।
[४४]

विशेष अर्थ-शक्ति नहीं रखते, चरण की पूर्ति करने का हो काम देते जान पड़ते हैं। बात यह है कि नित्य कुछ न कुछ पद बनाना उनका नियम था। उन्होंने बहुत अधिक पद कहे हैं । फुटकर पद कहते चले गए हैं; इससे एक ही भाववाले बहुत से पद भी आ गए हैं और कहीं कहीं भाषा भी शिथिल हो गई है। अंधे होने के कारण लिखे पदों को सामने रखकर काटने छाँटने या हरताल लगाने का उन्हें वैसा मौका न था जैसा तुलसीदास को।

उपासना-पद्धति के भेद के कारण सूर और तुलसी की रचना में जो भेद कहा जाता है उस पर भी थोड़ा ध्यान देना चाहिए। तुलसी की उपासना सेव्य-सेवक भाव से कही जाती है और सूर की सख्य भाव से। यहाँ तक कि भक्तों में सूरदासजी श्रीकृष्ण के सखा उद्धव के अवतार कहे जाते हैं। यहाँ पर हमें केवल यह देखना है कि इस उपासना-भेद का सूर की रचना के स्वरूप पर क्या प्रभाव पड़ा है। यदि विचार करके देखा जाय तो सूर में जो कुछ संकोच का अभाव या प्रगल्भता पाई जाती है वह गृहीत विषय के कारण। इन्होंने वात्सल्य और श्रृंगार ही वर्णन के लिए चुने हैं। जिसे बालक्रीड़ा और श्रृंगारक्रीड़ा का अत्यंत विस्तृत वर्णन करना है वह यदि संकोच भाव छोड़ लड़कों की नटखटी, यौवन-सुलभ हास परिहास आदि का वर्णन न करेगा तो काम कैसे चलेगा? कालिदास ने भी कुमार-संभव में पार्वती के अंग-प्रत्यंग का श्रृंगारी वर्णन किया है। तो क्या उनकी शंकर की उपासना भी सख्य भाव की हुई और उनका वह वर्णन उसी सख्य भाव के कारण हुआ? थोड़ा सा ध्यान देने से ही यह जाना जा सकता है कि आरंभ में सूर ने जो बहुत दूर तक विनय के पद कहे हैं, वे दीन सेवक या दासं के रूप ही कहे हैं