यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
४६
पहिला हिस्सा
 


इन्दु० । तो ये सब तुम्हारे बाप या ससुर के नोकर होंगे? जरूरत पड़ने पर तुम्हें उनसे इजाजत लेनी पड़ती होगी ?

विमला० । (एक लम्बी सांस लेकर ) नही बहिन । ऐसा नहीं है। हम दोनो अपने घर और ससुराल से मंजिलों दूर पडे़ हुए हैं। हम लोगो को किसी की कुछ खबर ही नहीं बल्कि यो कहना कुछ अनुचित न होगा कि अपने नातेदारो के खयाल से हम दोनों बहिनें मर चुकी है और किसी को खोजने या पता लगाने की भी जरूरत नहीं ।

इन्दु०। (आश्चर्य से) तुम्हारी बातें तो वही ही विचित्र हो रही है । अच्छा तो तुम यहाँ किसके भरोसे पर बैठी हो और तुम्हारा मददगार कौन है?

विमला० । यह बहुत ही गुप्त बात है, तुम भी किसी से इसका जिक्र न करना । मै यहाँ इन्द्रदेव के भरोसे पर हूँ । वही मेरे मददगार है और यह उन्ही का स्थान है । वही मेरे बाप है, वही मेरे ससुर है, और इस समय वही मेरे पूज्य इष्टदेव हैं ।

इन्दु० । कौन इन्द्रदेव?

विमला० । वही तिलिस्मी इन्द्रदेव । मेरे ससुर के सच्चे मित्र !!

इन्दु० । (सिर हिला कर) आश्चर्य आश्चर्य !! और तुम्हारे ससुर को इस बात की खबर नहीं है।

विमला० । हाँ बिल्कुल नही है ।

इन्दु० । यह कैसी बात है।

विमला० । ऐसी ही बात है। मैं जो कह चुकी कि उन लोगो के खयाल से हम दोनो इस दुनिया में नही है।

इन्दु० । आखिर उन्हें इस बात का विश्वास कैसे हुआ कि जमना और सरस्वती मर गई?

विमला० । सो मै नही जानती क्योकि यह कार्रवाई इन्द्रदेवजी की है। मैं सरयू मासी (इन्द्रदेव की स्त्री) के यहाँ न्योते में आई थी उसी

भू० १-४