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६५ दूसरा भाग भूत० । मुझे न तो तुम्हारे साथ किसी तरह की दुश्मनी हो है और न मैं व्यर्थ लडना ही चाहता हूं ,हाँ इतना जरूर पाहता हूँ कि जमना और सरस्वती का सच्चा सच्चाहाल मुझे मालूम हो जाय। न मालूम किट नालायक ने उन्हें समझा दिया है कि मैं अपने दोस्त दयारामजी का घातक हूं तथा इस बात पर उन्होंने विश्वास करके मेरे साथ दुश्मनो करने पर कमर बांध ली है, और.... प्रभा० । (बात काट कर ) प्रोफ, इन पचडो को मैं सुनना पसन्द नहीं करता, इस बारे में मै पहिले ही कह चुका है कि तुम जानो और वे जाने, तुम्हारा तावेदार नहीं है कि तुम्हारे लिये उनको समझाने जाऊ । भूत 01 (कोष के साप) तुम प्रजव ढग पर बातें कर रहे हो तुम्हारा मिजाज तो पासमान पर चढ़ा हुआ है !! प्रभा० । वेशा ऐसा हो है, तुम धोखा देकर मुझे गिरफ्तार कर लाए हो इसलिये मैं तुमसे बात करना भी पसन्द नहीं करता। भूत० 01 फिर ऐसा करने से तो नहीं चलता, तुम्हें झक मार कर मेरी बातों का जवाब देना पड़ेगा। यह कह कर गूसनाय ने भी म्यान से तलवार निकालो पोर पतरा ययन कर सामने बा हो गया । प्रमा० । तुम्हारी तलवार विल्गुल वेकार है, कुछ भी काम नही देगी, पलाप्रापोर देखो क्या होता है । भूत० हा हो, देखो यह समसार कोसा मजा करती है, मैं तुम्हें जान से न मारगा बल्कि वेकार करके छोटगा। तनाह के भूतनाप ने प्रभाकरसिंह पर वार किया जिसे उन्होने बडी चालाकी के साप पपनो तन्दवार पर रोका। प्रभाकरसिंह को तलवार पर पढ़ने के साथ हो भूतनाय को तलवार कट पार दो टुकडे हो गई क्योंकि वह हर एक हर्वे को काट सकतो घो। भूत- नाप ने टूटो हुई तलवार फेंक दी पोर कमर से खजर निकाल कर वार भू०२-५