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भूतनाथ ३० n गुलावसिंह ने प्रभाकरसिंह की तरफ देख कर कहा, "कुछ देर के लिये यहा माराम कीजिये, पानी पीजिये, और हाथ मुह घो ठण्ढे होकर सफर की हरारत मिटाइये !" इसके जवाब प्रभाकरसिंह ने कहा, "पानी पीने के लिये हम लोगों के पास लोटा डोरी तो है नही, हा आगे किसी ठिकाने पर चमें तो सभी कुछ हो सकता है, बल्कि वहा खाने पीने का भी सुवीता होगा!" इन दोनों की बातें सुन कर वह मुसाफिर जो कूए की जगत पर लेट' -इमा था उठ बैठा और बोला, "हा हा आप क्षत्रो जान पड़ते हैं और मैं भी गौड ब्राह्मण हू, अभी अभी यह लोटा मांज कर मैंने रखा है अाप पानी •खीच लीजिये।" "मति उत्तम" कह कर गुलाबसिंह ने लोटा डोरी उठा ली और प्रभा करसिंह उसी जगत पर बैठ गये। गुलाबसिंह ने कूए से जल निकाला और दोनो दोस्तों ने हाथ मुह धोया। इसके बाद पुन जल निकाल कर दोनो ने थोडा थोडा पीया फिर लोटा माज मुसाफिर के सिरहाने उसी जगह रख दिया । गुलाबसिंह यद्यपि होशियार पादमी थे मगर इस जगह एक मामूल वात में भूल कर गये । उन्हें उचित था कि अपने हाथ से लोटा मांज कर तव जल पान करते या मुह हाथ धोते, मगर ऐसा न करने से दोनों ही को तकलोफ उठानी पड़ी। वह मादमी जो कूए पर पहिले ही से आराम कर रहा था वास्तव में भूतनाथ था। वह इन दोनों की माहट लेता हुआ इनसे कुछ ही दूर पार आगे सफर कर रहा था वल्कि यों कहना चाहिये कि कभी भागे कभी पीछे कभी पास कभी दूर जव जैसा मौका पाता उसी तरह उन दोनों के सार सफर कर रहा था और इस समय पहिले ही से यहाँ माकर इन लोगों के घोखा देने के लिये भटका हुमा था। प्रभाकर० । (गुलाबसिंह से ) यह कूमा है तो मच्छे मौके पर मग