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दूसरा भाग
 

इतना कह कर कला उठ खडी हुई और गदाधरसिंह को साथ लिये हुए पहाडी के नीचे उतरने लगी।

पाठको को समझ रखना चाहिये कि इस सुन्दर घाटी से बाहर निकल जाने के लिये केवल एक ही रास्ता नहीं है बल्कि कई रास्ते है जिन्हें मौके मौके से समयानुसार ये लोग अर्थात् कला और विमला काम में लाया करती हैं और इनका हाल किसी मोके पर आगे चल कर मालूम होगा। इस समय हम केवल उसी रास्ते का हाल दिखाते हैं जिससे गदाधरसिंह को साथ लिये हुए कला बाहर जाने वाली है।

कला पहाडी के कोने की तरफ दवती हुई नीचे उतरने लगी। धूप बहुत तेज हो चुकी थी और गरमो से उसे सख्त तकलीफ हो रही थो तथापि वह गौर से कुछ सोचती हुई पहाड़ी के नीचे उतरने लगी। जव करीब जमीन के पास पहुंच गई तो एक ऐसा स्थान मिला जहाँ जंगली झाडिया बहुतायत से थी और वहां पत्थर का एक छोटा बुर्ज भी था जिस पर चढने के लिए उसके अन्दर की तरफ छोटो छोटो तीस या पैतीस सीढिया बनी हुई थी। उस वुर्ज के पर लोहे की चैरुखी भएडी लगी हुई यो अर्थात् लोहे के बनावटी बाँस पर लोहे के ही पत्तरो को बनी चौरुखी झंडी इस ढंग को बनी हुई थी कि वह घुमाने से घूम सकती थी। एक झंडी का रंग सुफेद, दूसरी का स्याह, तीसरी का लाल और चौथी झंडी का पीला था। इस समय पीले रंग वाली झंडी का रुख बंगले की तरफ घूमा हुआ था। वहा पर खडी होकर कला ने गदाधरसिंह मे कहा, "बस इसी जगह बाहर निकल जाने के लिये एक सुरंग है और यह बुर्ज उसकी ताली है अर्थात् दर्वाजा खोलने के लिये पहिले मुझे इस बुर्ज के ऊपर जाना होगा अस्तु तुम इसी जगह खड़े रहो, में क्षण भर के लिए ऊपर जाती हुँ।"

गदा०। (कुछ सोच कर) तो मुझे भी अपने साथ लेतो चलो, मैं देखूँगा कि वहा तुम क्या करती हो।

कला०। (मुस्कुरा कर) तो तुम इस रास्ते का भेद जानना चाहते हो!