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दूसरा भाग
 



कर) मैं विश्वास दिला दुँगा कि मुझ पर झुठा इल्जाम लगाया गया है।

विमला०। (कई कदम पीछे हट कर और नफरत के साथ) बस दूर रह मुझसे दुष्ट! मैं तेरी सूरत नहीं देखा चाहती।।

गदाधर० । (अपने ऊपर से स्याह कपड़ा हटा कर) नहीं तुम मेरी सूरत देखो पहिचानो और सुनो कि मैं क्या कहता हूं।

विमल०। सिवाय बात बनाने के तू और क्या कहेगा? तू अपने माथे से कलंक का टीका किसी तरह नहीं धो सकता और न वह बात झूठी हो सकती है जो मैं सुन चुकी हूँँ। दलीपशाह और शम्भु अभी तक दुनिया में मौजूद हैं और में भी खास तौर पर इस बात को जानती हूँ।

गदाधर०। मगर सच बात यह है कि लोगों ने तुम्हें धोखा दिया और असल भेद को छिपा रक्खा। खैर तुम अगर मुझ पर विश्वास नही करती तो मुझे ज्यादे खुशामद करने की जरूरत नहीं, अब मैं सिर्फ दो चार बातें पूछ कर चला जाऊँँगा। एक तो यह कि तुम मुझे गिरफ्तार करके यहा लाई थी मगर मै अपनी चालाकी से छूट गया, अब बताओ मेरे साथ क्या सलूक करोगी?

विमला०। अपने दिल का बुखार निकालने के लिये जो कुछ मुझसे बन पडेगा करूंँगी, इसे तुम खुद सोच सकते हो।

गदाधर०। पर मैं तो अब स्वतन्ध हूँ, अगर चाहू तो तुम तीनो को इसी जगह खत्म करके रख दूँँ। मगर नही मैं नमक का ख्याल करता हूँ, ऐसा कदापि न करूँँगा, हा तुमसे बचने के लिये उद्योग जरूर करूंगा।

विमला०। कदाचित ऐसा ही हो।

इतना कह विमला ने कला की तरफ देखा।

गदाधरसिंह विमला से बात कर रहा था मगर उसे इस बात की खबर न थी कि कला क्या कर रही है अथवा क्या किया चाहती है।

कला ने अपने बगल में से एक छोटा सा बाँस का बना हुपा तमचा निकाला और गदाधरसिंह (भूतनाथ) की तरफ उसका मुँँह करके चलाया।