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दूसरा भाग
 



सदर दर्वाजे पर गई तब उनके पास किसी तरह की रोशनी मौजूद न थी और न इस काम के लिए रोशनी की जरूरत ही थी, परन्तु जब तक वे पहरा देने वाली लौंडी से बातचीत करती और पहाडी के ऊपर वाली रोशनी की तरफ देखती रही तब तक एक आदमी जो अपने को स्याह कपडे से छिपाये हुए था आड़ देता हुआ सदर दर्वाजे के पास पहुँँचा और न मालूम किस ढंग से उस बंगले के अन्दर दाखिल हो गया क्योकि वे तीनो बहिनें और पहरा देने वाली लौंडी पहाड़ी को रोशनो की ताज्जुब के साथ देखती हुई सदर दर्वाजे से कुछ आगे की तरफ बढ गई थी और उन्हें इस बात का कुछ ख्याल न था कि दुश्मन बंगले में आपहुँचा और अपना काम किया चाहता है । खैर वे तीनों बंगले के अन्दर घुसीं तो दर्वाजा वन्द करती हुई छत पर चढ गई, जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है।

वे तोनो बहिनेंं उन कई जगह जलती हुई आग की रोशनियो को गौर से देख रही थी जो अब धीरे धीरे ठन्डी हो रही थी।

कला०। अब आग थोड़ी ही देर में बिल्कुल ठंएढो हो जायगी ।

विमला०। हाँ और इससे मालूम होता है कि भूतनाथ कही आगे की तरफ बढ़ गया।

"आगे की तरफ नहीं बढ गया बल्कि इस तरफ चला आया और विश्वास दिलाया चाहता है कि वह आपका दुश्मन नही बल्कि दोस्त है।"

यह आवाज़ छत के ऊपर आने वाले दर्वाजे की तरफ से आई थी जो उन तीनों बहिनो के पास ही था।

इस आवाज़ ने उन तीनों को चौंका दिया, वे उठ खड़ी हुई और उस दर्वाजे को तरफ देखने लगी। अब यहां पर वैसा अन्धकार न था जैसा नीचे खास करके पेड़ों की छाह के सवव से था। चन्द्रदेव उदय हो चुके थे और उनकी चादनी पल पल में बराबर बढती चली जा रही थी, अस्तु उन तीनों बहिनों ने साफ देख लिया दर्वाजे के अन्दर एक पैर बाहर और दूसरा भीतर किये कोई आदमी स्याह सबादा ओढ़े खडा है।