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( २० ) चन्द्रिका की भूमिका में दिए गए इस ग्रंथ के अाधार पर तैयार किया गया है। पाठ शुद्ध करने के लिए सं० १९१७ फाल्गुन कृ० १३ शनिबार को बख्शी विजयसिंह द्वारा लिखी गई एक हस्तलिखित प्रति तथा ६० दुर्गादत्त द्वारा संशोधित तथा लाइट प्रेस में छपी हुई प्रति से सहायता ली गई है । अल कार आदि के लक्षण तथा उदाहरणों के अर्थ स्पष्ट करने के साये ग्रंथ के अंत में टिप्पणो दे दी गई है। महाराज जसवंतसिंह का जबन धरित्र बहुत ही संक्षेप में दिया गया है. और उनका चित्र, जो साथ लगाया गया है, जोधपुर की राजकीय चित्रशाला से मं० देवीः पाद के अनुग्रह से प्राप्त हुश्रा था । भाषाभूषण का पहला संस्करण सं० १६१ में प्रकाशित हुआ था । उस का दूसरा संस्करण सं० १६६० में हुआ और अब यह तीसरः संस्करण हो रहा है। कातिक पूर्णिमा सं. १९६६

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