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आंतर सचारी-भाव

मद, विषाद, उन्माद, लाज, अवहित्था जानौ।
सहित चपलता ए विशेष सिङ्गार बखानौ॥
अरु समान मत सम्भोग मैं, सकल भाव बरनन करौ।
आलस उग्रता भाव द्वै, सहित जुगुप्सा परिहरौ॥
आरस ग्लानि निर्वेद श्रम, उत्कण्ठा जड़ जोग।
सङ्कापसुमृति सुमृति अब, बोधोनाद वियोग॥

शब्दार्थ और भावार्थ—दोनों सरल है।