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भाव-विलास

यह देवजी की प्रथम रचना है। हिन्दी भाषा के रीति-ग्रन्थों में यह उच्चकोटि का ग्रन्थ माना जाता है। इन्होंने केवल सोलह वर्ष की अवस्था में इसकी रचना की थी। यह इनकी प्रथम रचना होने पर भी इसके छन्दो में कहीं भी शैथिल्य नहीं है और प्रौढ़ कविता में जो गुण होने चाहिए वे सभी इसमें विद्यमान हैं। इस ग्रन्थ को इन्होंने पहले-पहल बादशाह औरंगज़ब के बड़े पुत्र आजमशाह को सुनाया। आजमशाह हिन्दी के प्रेमी तथा जानकार और गुणज्ञ थे। उन्होंने उक्त ग्रन्थ की बड़ी प्रशंसा की। भाव-विलास के अंत में लिखा है कि :—

दिल्लीपति नवरंग के, आज़मसाहि सपूत।
सुन्यो, सराह्यो ग्रन्थ यह, अष्टयाम संजूत॥

इस ग्रन्थ मे इन्होंने भाव, विभाव, अनुभाव, हाव, नायक, नायिका और अलंकारों का वर्णन किया है। परन्तु अन्य आचार्यों द्वारा वर्णित रसादि के वर्णनों से इन्होने कुछ विशेषता रखी है।

भावविलास की विशेषता—भरतादि आचार्यों ने संचारी भावों के केवल ३३ भेद माने हैं; परन्तु देवजी ने 'छल' को एक चौतीसवाँ भेद और माना है। रसो के इन्होंने दो भेद माने हैं। लौकिक और अलौकिक। फिर लौकिक के तीन भेद स्वप्न, मनोरथ और उपनायक तथा अलौकिक के शृंगार, हास्य आदि नौ भेद लिखे हैं। अलंकारों में इन्होंने केवल ३९ मुख्य माने हैं और उन्हीं का इस ग्रन्थ में वर्णन किया है। शेष अलंकारों के सम्बन्ध में इनका मत है कि वे इन्हीं के भेद और उपभेद हैं।

इस ग्रन्थ का सम्पादन करके मैंने प्रत्येक दोहा, सवैया और कवित्त के आवश्यकतानुसार शब्दार्थ और भावार्थ दे दिये हैं; जिससे ग्रन्थ को समझने में कठिनाई न हो। जहाँ शब्दार्थ अथवा भावार्थ बोधगम्य