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आंतर संचारी-भाव

तुम......मानो—तुम यहाँ नहीं हो यह मैं नहीं मानती। बिठुरे—अलगहुए। अमतैं—अलग।

१३—लाज
दोहा

दुराचार अरु प्रथम रत, उपजै जिय संकोचु।
लाज कहै तासों जहाँ, मुख गोपन गुरु सोचु॥

शब्दार्थ—दुराचार—व्यभिचार। मुख गोपन—मुँह छिपाने का भाव।

भावार्थ—व्यभिचार अथवा प्रथम समागम के समय जो संकोच उत्पन्न होता है और जिसके कारण गुरुजनों के भयवश मुख छिपाने का भाव उत्पन्न होता है उसे लाज कहते हैं।

उदाहरण
सवैया

आजु सखी सुख सोई सुतो, सखी सांचेहू सोच सकोच के हाते।
हातौ भयो कहु कैसे संकोच, बढ़ै निस नाह सों नेह के नाते॥
कैसी कही रति मानि रही, रति मन्दिर मैं मदिरा मद माते।
मारि हथेरी हरे हिय देव, सुदाबि रही अँगुरी इक दाँते॥

शब्दार्थ—नेह के नाते—प्रेम का रिश्ता। दाविरही—दबा रही। अँगुरी—उँगली। दाँते—दाँतों तले।

१४—चपलता
दोहा

रागरु क्रोध बिरोध तें, चपल चेष्टा होय।
कारज की उत्तालता, कहत चपलता सोय॥