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अनुभाव


  शब्दार्थ—ठाढो—खड़ा हुआ। चितौत—देखता है। चकोर—एक पक्षी जो चन्द्रमा को प्यार करता है। अनतै—दूसरी जगह। इतौ—इतना। चित—मन। सामुहैं—सामने। भागते—भाग्यवश। उऔ—उगा।

उदाहरण दूसरा—(नयन-प्रसन्नता)
सवैया

आई ही गाय दुहाइवे कों, सु चुखाइ चली न बछानको घेरति।
नैकु डराय नहीं कब की, वह माइ रिसाय अटा चढ़ि टेरति॥
यों कविदेव बड़े खन की, बड़रे द्दग बीच बड़े द्दग फेरति।
हौं मुख हेरति ही कबकी, जबकी यह मोहन को मुख हेरति॥

शब्दार्थ—बछान—बछड़े। नैकु—थोड़ा भी। डराय नहीं—नहीं डरती। माइ—माता। रिसाय—नाराज़ होती है। बड़े खन—बड़ी देर। बड़रे—बड़े। द्दग—आँखें। हौं—मैं। हेरति ही—देखती थी।

उदाहरण तीसरा—(चल-चितौनि)
सवैया

हरि को इतै हेरत हेरत हेरि, उतै डर आलिन को परसै।
तनु तोरि के जोरि मरोरि भुजा, मुख मोरि कै बैन कहे सरसै॥
मिस सों मुसक्याइ चितै समुहें, 'कविदेव' दरादर सों दरसै।
द्दगकोर कटाक्ष लगे सरसान, मनो सरसान धरैं बरसै॥

शब्दार्थ—इतै—इधर। हेरत हेरत—देखते देखते। उतै—उधर। आलिन—सखियाँ। तनु—शरीर। मरोरि—मरोड़ कर के। भुजा—बाहे। बैन—