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भाव-विलास

  शब्दार्थ—सोहे—अच्छी लगें। पमारी—मूंगा। मजीठ—लालरंग की औषधिविशेष। नजीक—निकट, पास। पी—पति। पिकबैनी—कोयल जैसी मधुर बोलनेवाली।

उदाहरण छठा—(विधु)
सवैया

दिन द्वैक तें सासुरे आई बधू, मन में मनु लाज को बीजबयो।
कविदेव सखी के सिखायें मरूकै, नह्यो हिय नाह को नेहनयो॥
चितबावत चैत की चन्द्रिका ओर, चितै पति को चित चोरिलयो।
दुलही के विलोचन वानन कौ, ससि आज को सान समानभयो॥

शब्दार्थ—मरूकैं—मुशकिल से। नह्यो—उत्पश्च हुआ। नाह—पति। नेह—स्नेह, प्रेम। चन्द्रिका—चांदनी। ससि—चन्द्रमा। सान—सिल्ली, धार रखने का पत्थर।

उदाहरण सातवां—(वसन्त)
सवैया

हेरत ही हरि लीनो हियो इन, आल रसाल सिरीष जम्हीरन।
चंपक बेली गुलाब जुही, पिचुमन्द मधूक कदम्ब कुटीरनि॥
खोलत काम कथा पिक बोलत, डोलत चंदन मन्द समीरनि।
केसर हार सिंगारन हू, करना कचनार कनैर करीरनि॥

शब्दार्थ—आल—वृक्षविशेष। रसाल—आम। सिरीष—वृक्षविशेष। जन्हीरनि—जम्बीरी नीबू, मरुआ। चंपक, गुलाब, जुही पिचुमन्द—पुष्प विशेष। पिक—पपीहा, कोयल। समीरनि—हवा। केसर, हार सिंगार, कचनार, कनैर, करीरनि—वृक्ष विशेष।